पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर अच्छी बहस हुई। यहां तक कि देबाशीष जी द्वारा चिट्ठा चर्चा पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी वह जारी रही। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा।
अंग्रेजी चिट्ठा जगत में तो यह बहस कई वर्षों से जारी है। इस विषय पर सबसे अच्छी परिचर्चा पिछले वर्ष हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा Blogging, Journalism & Credibility: Battleground and Common Ground पर आयोजित सम्मेलन के दौरान हुई। अमेरिका में यह मामला कोर्ट में भी पहुंचा है। अदालतों ने इस बारे में स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश भी की है। लेकिन अदालतों के क्षेत्राधिकार (jurisdiction) इतने सीमित दायरे में लागू होते हैं कि पूरे ग्लोब में फैले ब्लॉग जगत के लिए मान्य नहीं हो सकते। हर देश के अपने क़ानून हैं और अदालतों द्वारा की जाने वाली उनकी अलग-अलग व्याख्याएँ हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि टेक्नोलॉजी जहां रोज-ब-रोज तेजी से बदल रही है, क़ानून उसी पुरानी, शनि की मंथर चाल से आगे बढ़ रहा है। जब तक कोई नया क़ानून बनता है तब तक टेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ चुकी होती है कि क़ानून अप्रासंगिक हो चुका होता है। सायबर लॉ में मेरे गुरु और सुप्रीम कोर्ट के वकील वकुल शर्मा कहते हैं:
Technology has always posed problems for law but lawyers and judges have been managing the problems by stretching the meaning of the existing laws without breaking the spirit of laws.
(टेक्नोलॉजी हमेशा से क़ानून के लिए मुश्किलें खड़ी करती रही है लेकिन वकील और न्यायाधीश इन मुश्किलों को मौजूदा कानूनों की व्याख्या को खींच-तान करके क़ानूनों की मूल भावना को बगैर नुकसान पहुंचाए हल करने की कोशिश करते रहे हैं।)
इंटरनेट ने हमें एक ऐसे युग में पहुंचा दिया है जहां हम घर बैठे ही दुनिया की तमाम अच्छाइयों और तमाम बुराइयों से प्रभावित हो सकते हैं। इंटरनेट ने भगवान और शैतान, दोनों को हमारे मन का पता दे दिया है। कोई भी हमारे मन के साथ खेल सकता है, उसे संवार सकता है और उसे बिगाड़ सकता है। तमाम तरह के घोटाले, धोखाधड़ी, आतंकवादी वारदातें, सांप्रदायिक वैमनस्य, अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र इंटरनेट के जरिए होने लगे हैं। इसी तरह समाज सेवा, धर्म, अध्यात्म, अच्छी पुस्तकों और सदविचारों के प्रचार-प्रसार, आदि के काम भी इंटरनेट के जरिए होते हैं। चार्ल्स डिकेन्स ने ‘ए टेल ऑफ टू सीटिज’ में जो बात 1859 में कही थी, लगता है कि वह आज के इंटरनेट युग पर भी लागू होती है:
“ It was the best of times, it was the worst of times; it was the age of wisdom, It was the age of foolishnesses… we had everything before us, we had nothing before us.”
(यह सबसे अच्छा समय है, यह सबसे बुरा समय है; यह समझदारी का युग है, यह नासमझी का युग है….हमारे सामने सब कुछ है, हमारे सामने कुछ भी नहीं है।)
यह जो वेब जगत है, वह हमारी भौगोलिक दुनिया की छाया प्रतिलिपि नहीं है। इसे किलोमीटर और घंटे के स्थूल मात्रकों में नहीं, बल्कि इसे ‘बिट्स’ और ‘बाइट्स’ जैसे सूक्ष्म मात्रकों में मापा जाता है। इस दुनिया के तमाम लोगों की अपनी एक अलग राष्ट्रीयता है और यहाँ वे ‘सिटीजन’ नहीं, बल्कि ‘नेटीजन’ कहलाते हैं। हमारे क़ानूनों की सीमा यह है कि वे ऐसी राजनीतिक, भौगोलिक और भौतिक दुनिया के लिए बनाए गए हैं, जो स्थिर, परिभाषित और आबद्ध है, जबकि इसके विपरीत वेब जगत गतिशील, अपरिभाषित और असीमित है। इस वेब जगत के नियमन के लिए ऐसे गतिशील कानूनों की जरूरत है जो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें। क़ानून के रखवालों के लिए यह जरूरी है कि वे टेक्नोलॉजी की भाषा को समझें और टेक्नोलॉजी के प्रयोगकर्ताओं के लिए भी यह जरूरी है कि वे क़ानून की भाषा को समझें। यह कहने से काम चलने वाला नहीं है कि टेक्नोलॉजी और क़ानून पूर्व और पश्चिम की तरह हैं, जो आपस में कभी मिल नहीं सकते। लेकिन यह सच है कि टेक्नोलॉजी की जो रफ्तार है उसकी बराबरी क़ानून कभी नहीं कर सकता। जैसा कि ओलिवर वेन्डेल होम्स कहते हैं:
It cannot be helped, it is as it should be, that the law is behind the times.
आगे पढ़िए »(इसका कोई उपाय नहीं है, यह ऐसे ही रहने वाला है, कि क़ानून समय से हमेशा पीछे रहता है।)
(क्रमश:)


बहुत सुन्दर प्रविष्टी ।
बहुत सही व्याख्या।
आपने विषय को और अधिक व्यापक बना दिया है।
उस दिन टीवी पर एक बहस में कोई कह रहा था कि यह तकनीक परमाणू शक्ति की तरह है जो कि इसके प्रयोग करने वाले के अपने विवेक पर निर्भर करती है कि वह इससे उर्जा का निर्माण करता है या बम बनाने का ।
लेख अच्छा है पर आपसे थोड़े लंबे लेख की आशा थी. लगा कि आप थोड़ा और लिखते तो अच्छा था. ओ…आपने क्रमश: लिखा है .. प्रतीक्षा रहेगी.
आजकल न जाने क्या हो रहा है ..एक महिला ब्लौगर ने जब हमारा (गलत) नाम चिट्ठे में लिया तो लिंक गलत लग दिया .य़हां भी शिल्पी जी ने तारीफ तो की (सही) नाम लेकर पर लिंक फिर गलत लग गया.
वाह, बहुत अच्छे.
सही लिखा है कि “इंटरनेट ने भगवान और शैतान, दोनों को हमारे मन का पता दे दिया है। कोई भी हमारे मन के साथ खेल सकता है, उसे संवार सकता है और उसे बिगाड़ सकता है।”
अच्छा लगा विषय को व्यापकता से लेकर लिखा देख.
कानून को बनाने वालों को तथा लागू करने वालों को तकनीक के साथ चलना होगा, जो असम्भव दिख रहा है.
अच्छा है। आगे के भाग की प्रतीक्षा है!
कानून अपनी प्रकृति से ही समय के पीछे चलने वाली विधा है, किन्तु इसका समय से बहुत पीछे चलना बहुत अनर्थकारी हो सकता है।
@ काकेश जी,
यह लेख-श्रृंखला भी धारावाहिक रूप से चलेगी। लेख को जानबूझकर छोटा रखा, क्योंकि बहुत से पाठक लेखों की लंबाई के कारण ही उन्हें पढ़े बगैर आगे बढ़ जाते हैं। फिर, समय के अभाव की शाश्वत समस्या तो है ही। चिट्ठाकारी दिनचर्या की अंतिम प्राथमिकता में है।
मैंने आपका नाम “धूमकेतु” ऐसे ही थोड़े न रखा था।
आप जहां से गुजरते हो, कुछ न कुछ हलचल पैदा कर ही जाते हो। यह आपके विलक्षण गुणों का ही असर है शायद!
लीजिए, लिंक सुधार दिया है और बोनस में पठनीय चिट्ठों की सूची में भी आपके चिट्ठे को जोड़ दिया है।
सहमत हूं.
इंटरनेट पर सबकुछ आपके विवेक पर ही निर्भर करेगा. कोई भी कानून शत प्रतिशत लागू नहीं हो पाएगा.
आगे की कड़ियों का इंतजार है.
यह जानकारी ज़रूरी थी। अगले भाग की प्रतीक्षा।
विषय अच्छा है। आगे के अंकों की प्रतीक्षा रहेगी।
बहुत अच्छा लिखा है आपने। आप अच्छा लिखते ही हैं। आप इसलिए अच्छा लिखते हैं, क्योंकि आप लिखने से पहले सोचने और तथ्यों को जुटाने की एक ज़रूरी प्रक्रिया से जूझते हैं। आपको बहुत-बहुत बधाई
अच्छा लेख लिखा है। आगे की कड़ी की प्रतिक्षा है।
घुघूती बासूती
bahut aacha lekh hai.thanks
बढ़िया है, आगे इंतजार है.
आपने सही विषय चुना है, और बहुत सही लिखा है – अगले भाग का इन्तेज़ार रहेगा
हमेशा की तरह एक अच्छा लेख है
अच्छा आलेख, लेख का छोटा होना ठीक है। क्योंकि कोई भी नियमित काफी देर तक पढ़ना पसंद नहीं करता है। वो भी कम्प्यूटर पर तेज रोशनी के सामने।
अगले अंक की प्रतीक्षा में।
बेहतरीन प्रविष्टि . इस क्रम में आगे की प्रविष्टियों की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी .
बहुत सटीक लेख, आपसे सहमत हूँ कि पाठक छोटे छोटे लेख पसंद करता है (फुरसतिया और समीर जी की बात छोड़ दें तो)। अगली कड़ी का इंतजार है।
ओलिवर वेन्डेल होम्स – जो कहें हैं वही अपन कह रहे थे कि तकनीक की रफ़्तार के सामने क़ानून की चाल धीमी है. यानी क़ानूनी धौंस के बूते व्यवहारिक नहीं हुआ जा सकता. आपकी पुरानी पोस्ट मे जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मुखौटाधारी और छापेमारी पर प्रकाश डाला गया था. यह लेख उसको ही अपडेट करता है.
दूसरी बात – पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता की बहस तो वह थी ही नहीं. दरअसल बहस की शुरूआत सांप्रदायिकता बनाम कथित सेकुलरवाद पर आधारित थी जो अब तक जारी है. और दोनों ही विचारधाराएं एक दूजे पर अवलंबित हैं. जब राजनीतिक एजंडे हमारे विचारों का हिस्सा बन जाते हैं तब यह पंगे होते हैं. यह उसी निरर्थक बहस का मूल था जिसे हम चिट्ठाकारिता बनाम पत्रकारिता की बहस समझ बैठे थे. चिट्ठाकारिता तो उसी दिन मीडिया का अंग हो गयी जिस दिन से यह शुरू हुई.
भाषा प्रवाह प्रभावोत्पादक है.. बधाई स्वीकार करें.