
हे भीष्म!
आप महान हैं, धर्मात्मा हैं, ज्ञानी हैं, वीर हैं
पितृभक्त हैं, बुजुर्ग हैं, संत हैं, अखंड ब्रह्मचारी हैं
अष्ट वसुओं में श्रेष्ठ हैं, उनके अवतार हैं
आप देवी गंगा मैया के पुत्र हैं
आपको कोई हरा नहीं सकता
परशुराम को भी आप उनकी औकात बता सकते हैं
निश्चय ही आप महानता के शिखर पुरुष हैं
लेकिन आप मेरे किस काम के हैं?
क्योंकि आपके सामने ही द्रौपदी का जब अपमान किया जाएगा
तब आप अपनी आँखें मूँद लेंगे
कोई नारी जब अपनी लाज बचाने के लिए गुहार लगाएगी
तब अपने आसन से आप हिलेंगे भी नहीं
जब आपके सामने ही कृष्ण को बंदी बनाने की कोशिश होगी
तब भी आप कुछ कर नहीं सकेंगे
जब कर्ण का कुलगोत्र पूछा जाएगा
और मुक़ाबले से उसे बाहर कर दिया जाएगा
तब भी आप अपने गुरुभाई की सहायता नहीं करेंगे
आप तो अर्धरथी कहकर उसे अपमानित करने की नीचता दिखाएंगे
धर्मयुद्ध में आप पांडवों का साथ देने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे
अंबा को अपहरण करके लाएंगे पर शादी करने से इंकार कर देंगे!
आपका सारा ज्ञान बेकार है, आपका अखंड ब्रह्मचर्य व्यर्थ है
आपकी वीरता बेमानी है, आपकी पितृभक्ति अनुकरणीय नहीं है
आप किसी काम के नहीं हैं
आपके मूल्य और आदर्श वरेण्य नहीं हैं
युग पर आप भारस्वरूप हैं
आपका होना न होना बराबर है
नए युग में आपकी कोई जरूरत नहीं है
आप विदा हो जाइए
आपको तो इच्छामृत्यु का वरदान है
आप स्वेच्छा से चले जाइए।
आप सड़ी-गली व्यवस्था के पोषक हैं
आप व्यवस्था से अंधों की तरह बंधे हुए हैं
व्यवस्था आपको नचा रही है
व्यवस्था के आप गुलाम हैं
व्यवस्था के इशारे पर आप हर कुकर्म करने को राजी हैं
व्यवस्था के हर कुकृत्य के आप मूक साक्षी हैं, सहयोगी हैं
आप धन्य हैं, आपको धिक्कार है!
मुझे चाहिए विदुर
वह दासीपुत्र, विनीत, अभिमानशून्य
समझदार, नीतिनिपुण, नीतिपरायण
सत्यवादी, सत्यकामी, सत्यधर्मी
वही सच्चा वीर है
अपने सामने वह कोई अन्याय नहीं होने दे सकता
द्रौपदी के अपमान का मूक, बेबस साक्षी बने रहना उसे गवारा नहीं है
किसी भी वक्त व्यवस्था को छोड़ सकने की तैयारी उसकी है
व्यवस्था का वह गुलाम नहीं है
वह गलत का, असत्य का, अन्याय का हमेशा विरोधी रहा है
वह कुर्सी छोड़ देगा पर अपना ज़मीर नहीं छोड़ेगा
मुझे वही चाहिए
मैं केशव की तरह उसके घर साग-रोटी खाना पसंद करूँगा
और अपने हृदय में उसके प्यार को हमेशा बसाकर रखूंगा
भीष्म! मुझे आप नहीं, मुझे तो विदुर चाहिए।
(मार्च, 2002)

अरे कविता भी करने लगे!!
यहाँ आक्रोश देखते ही बनता है, क्या बात है?
एक बात कहूँ तो आपकी दिनकर से तुलना करना उचित नहीं होगा क्योंकि दिनकर ने अपनी आहूति दे कर हिन्दी काव्य को शिखर तक पहुँचाया। पर मेरा मन नहीं मानता, मैं यह कहने को विवश हूँ कि आपकी कविता में दिनकर की छाप जरूर दिख रही है।
खास तौर पर यह पंक्ति मुझे अच्छी लगी -
क्योंकि आपके सामने ही द्रौपदी का जब अपमान किया जाएगा
तब आप अपनी आँखें मूँद लेंगे
कोई नारी जब अपनी लाज बचाने के लिए गुहार लगाएगी
तब अपने आसन से आप हिलेंगे भी नहीं
वाह! कविता तो बहुत शानदार लिखे हो।
शिल्पी जी,
लोग जानते हैं क्या कहेंगे इस कविता को पढ़कर? ऐसी कविताएँ अब कहाँ लिखी जाती हैं? पगला गया है क्या!
आपकी हर एक पोस्ट (चाहे वो हिन्दी के जिस भी विधा की हो) सारगर्भित होती है।
यह कहने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए-
आपका सारा ज्ञान बेकार है, आपका अखंड ब्रह्मचर्य व्यर्थ है
आपकी वीरता बेमानी है, आपकी पितृभक्ति अनुकरणीय नहीं है
आप किसी काम के नहीं हैं
आपके मूल्य और आदर्श वरेण्य नहीं हैं
युग पर आप भारस्वरूप हैं
आपका होना न होना बराबर है
नए युग में आपकी कोई जरूरत नहीं है
आप विदा हो जाइए
आपको तो इच्छामृत्यु का वरदान है
पहली बार किसी लेखक ने ताल ठोंककर कहा है कि आज विदुर की आवश्यकता है।
मुझे चाहिए विदुर
वह दासीपुत्र, विनीत, अभिमानशून्य
समझदार, नीतिनिपुण, नीतिपरायण
सत्यवादी, सत्यकामी, सत्यधर्मी
वही सच्चा वीर है
बहुत से उमड़ते हुए प्रश्नों को आज सृजन जी आप ने छेड़ दिया । ऐसे प्रश्न जिनके उत्तर मेरे पास आज तक नहीं हैं । जब सब कुछ आइने की तरह साफ़ है तो पांडवों के चरित्र को धर्म का अनुसरण करने वाला हमारे धर्म ने कैसे मान लिया। अगर कौरव दोषी थे तो पांडवों का चरित्र भी कुछ कम न था, ऐसे में श्रीकृष्ण जी का पांडवों का साथ देना भी मेरे समझ में नही आता।
सही है। अच्छा लिखा है!
आपकी यह कविता काफी अच्छी लगी !
bahut sahi!!
शिल्पी जी,
एक अच्छी कविता. इस कविता के माध्यम से आपने अपने मनोभावों का समुचित बखान किया है मगर मैं आपसे पूर्णरूपेण सहमत नहीं हूँ।
हालांकि अविवादित रूप से आपकी कविता उत्तम है मगर इसमें जो मनोभाव आपने दर्शाये हैं उसमें भीष्म के जीवन की कईं घटनाओं का जिक्र करते हुए आपने उन पर प्रश्न चिन्ह लगाया है। इंसान, आखिर इंसान होता है, आप भीष्म की योग्यता और व्यवहार पर मात्र इन चंद घटनाओं से प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकते।
आपने कविता के लिए जो भाव चुना है, उसके साथ पूर्णतया न्याय करने में भी सफल रहें है। आप एक अच्छे कवि भी है जानकर अच्छा लग रहा है। भविष्य और भी खूबसूरत कविताएँ पढ़ने को मिलेगी ऐसी उम्मीद भी स्वत: ही बंध गई है।
इस खूबसूरत कविता के लिए बधाई स्वीकार करें।
कमाल की कविता है, आप कविता भी लिखते हैं आज ही पता चला। यह पंक्तियाँ मन को छू गई।
आपका होना न होना बराबर है
नए युग में आपकी कोई जरूरत नहीं है
आप विदा हो जाइए
आपको तो इच्छामृत्यु का वरदान है
@ गिरिराज जोशी जी,
भीष्म की योग्यता पर भला कौन प्रश्न-चिह्न लगा सकता है! आरंभिक पंक्तियाँ तो उनकी महानता और योग्यताओं के गुणगाण के लिए ही समर्पित हैं। लेकिन उस महानता और योग्यता का क्या लाभ जब वह जरूरत पड़ने पर काम न आ सके। जिन घटनाओं का जिक्र ऊपर की पंक्तियों में किया गया है, वे महज “चंद घटनाएँ” नहीं हैं, बल्कि ये वैसी घटनाएँ हैं जिनके कारण महाभारत हुआ। ये वही घटनाएँ थीं जिसने उस पूरे युग की त्रासदीपूर्ण नियति को जन्म दिया था।
महान व्यक्तित्वों के कद का निर्धारण इतिहास इस आधार पर करता है कि संक्रमणकाल के सबसे चुनौतीपूर्ण अवसरों पर उन्होंने कैसा व्यवहार किया, क्या निर्णय लिए और वे किसके पक्ष में खड़े रहे।
लेकिन क्या आपको यह कविता आज के संदर्भ में भी कुछ कहती प्रतीत होती है? क्या कवि पाठकों तक इसका ध्वन्यर्थ पहुँचाने में कामयाब हो सका है?
सही लिखे हैं लेकिन मैं निम्न से सहमत नहीं हूँ:
जितनी मेरी समझ है, उसके अनुसार “हरण” और “अपहरण” में यह फ़र्क है कि “अपहरण” किसी बुरी नीयत से किया जाता है। दूसरे, जितना मैंने पढ़ा है, उसके अनुसार भीष्म ने काशी की राजकुमारियों का हरण करते समय यह स्पष्ट किया था कि वे मात्र प्रतिनिधी हैं, इसलिए उनका तो अंबा से विवाह करने का कोई अर्थ ही नहीं। तीसरे, अंबा ने स्वयं यह राजमाता सत्यवती से कहा था कि वह शाल्व को अपना पति मान चुकी है, इसी कारण उसका विवाह विचित्रवीर्य से न करवाकर उसे शाल्व के पास भेज दिया गया था। शाल्व ने अपने अहंकारवश उसे स्वीकार नहीं करते हुए अपमानित कर लौटा दिया तो अंबा ने हस्तिनापुर राज्यसभा में भीष्म पर यह आरोप लगाया कि भीष्म ने शाल्व के पास उसे भेज उसका अपमान करवाया है और भीष्म को उससे विवाह करना चाहिए, जो कि सरासर बेतुकी बात थी। अंबा ने अपना चुनाव शाल्व के रूप में किया जिसका आदर भीष्म और सत्यवती ने किया, तो उसका जो भी परिणाम निकला उसके लिए मैं नहीं समझता कि भीष्म किसी प्रकार दोषी हैं। मैं समझता हूँ कि यही कारण था कि परशुराम भी भीष्म को हरा नहीं पाए थे क्योंकि परशुराम सही नहीं थे, उनको उसी अधूरे “सत्य” का ज्ञान था जो कि उनको अंबा ने सिखाया-पढ़ाया था।
बाकी मौन रहने वाली बातों से और अंधभक्ति और अनुसरण से मैं भी सहमत हूँ, विदुर का भी इसलिए प्रशंसक हूँ।
… yakinn bahut sundar. aap itane naye kavi bhi nahin lagte in panktiyon mein. badhayi.
@ डॉ. प्रभात टंडण जी,
दुनिया हमेशा विजेता का अनुसरण करती आई है। इसलिए इतिहास और धर्म उनके अनुरूप ढल जाते हैं। यदि रावण और दुर्योधन के दृष्टिकोण से देखें तो अपनी जगह वे भी सही थे। मगर उन्होंने कुछ ऐसे अक्षम्य अपराध किए जिनका दंड उनको आखिरकार मिलना ही था।
श्रीकृष्ण तटस्थ नहीं रह सकते थे। युगनायक कभी तटस्थ नहीं रहते। उन्हें किसी एक का पक्ष तो लेना ही था। उन्होंने तो दुर्योधन को नारायणी सेना या स्वयं नि:शस्त्र कृष्ण में से किसी एक को चुन लेने का पहला अवसर भी प्रदान किया था। अब यह तो दुर्योधन की समझदारी ही ऐसी थी कि उसने श्रीकृष्ण को अपने पक्ष में शामिल करने की बजाय उनकी सेना को साथ में लेने का विकल्प पसंद किया। इसमें श्रीकृष्ण का दोष कहां है? उन्होंने तो अपने बड़े भैया बलराम को इस महायुद्ध में तटस्थ बने रहने पर खरी-खोटी तक सुना दी थी। यह सर्वज्ञात है कि बलराम दुर्योधन के पक्ष में थे, उनके गुरु रह चुके थे और बहन सुभद्रा का उससे विवाह भी कराना चाहते थे। अर्जुन द्वारा सुभद्रा का हरण कर लिए जाने के बाद वे पांडवों के विरोधी हो गए थे। इसलिए वे चाहते तो दुर्योधन के पक्ष में खड़े हो सकते थे और उसे अनुचित भी करार नहीं दिया जा सकता था। यदि ऐसा होता तो महाभारत का परिणाम शायद कुछ और ही हुआ होता। लेकिन वे अपने अनुज श्रीकृष्ण की आंतरिक इच्छा और उनकी योजनाओं के उद्देश्य को समझते थे, इसलिए तटस्थ रहे।
@ अमित जी,
‘हरण’ और ‘अपहरण’ के बीच के सूक्ष्म अंतर को आपने खूब पकड़ा। लेकिन नीयत तो रावण की भी बुरी नहीं थी। उसने भी सीता को उतना ही सम्मान दिया था जितना कि भीष्म ने अंबा को दिया था। लेकिन वे दोनों ही घटनाएँ कुकृत्य की श्रेणी में आती हैं, क्योंकि उनमें नारी की मर्जी शामिल नहीं थी। ‘हरण’ तो श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी किए थे, लेकिन उन घटनाओं में नारी की सहर्ष सहमति थी।
सुलभा: पुरुषा: राजन् सततं प्रियवादिनः
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:
(हे राजन! सतत् प्रिय बोलने वाले पुरुष तो आसानी से मिल जायेगें। किन्तु अप्रिय पथ्य (अप्रिय लगने वाली बात या कार्य) को कहने वाले, और सुनने वाले – दोनो ही बड़ी मुश्किल से मिल पाते हैं)
@ सृजन शिल्पी जी,
शिल्पी जी, जहाँ तक प्रश्न महानता का है मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ कि भीष्म भी एक इंसान थे। मगर उन्होंने जो अपने जीवनकाल में किया वो एक साधारण मनुष्य की सोच से काफी उपर था। शायद यही कारण है कि उन्हें महापुरूषों की श्रेणी में रखा जाता है। आप महाभारत के मूल में भीष्म को केन्द्रित कर रह हैं मगर आपको यह भी ख्याल रखना चाहिये कि महाभारत कि मूल वजहों को खोजा जाये तो और भी बहुत कुछ है।
हाँ यह बात सही है कि भीष्म का जिस प्रकार का व्यक्तित्व रहा है, उसी प्रकार की उम्मीदें भी होना स्वाभाविक है। मगर उनके एक अच्छे इंसान होने पर मुझे कदापि शंका नहीं है।
हाँ, निश्चित रूप से। मैं पहले भी कह चुका हूँ कि कवि अपनी सोच और विषय के साथ पूर्णतया न्याय करने में सफल रहा है। मैं तो यही मानता हूँ कि यदि आपने अपनी सोच को पूर्ण ईमानदारी से काव्य में पिरो दिया, तो आपका काम हो गया है। अब यह पाठकों पर छोड़ देना चाहिये कि वे आपकी सोच से कितना सहमत हैं और कितना असहमत।
एक बेहतरीन कविता प्रस्तुत कर आपने हमें भी उम्मीद करने को बाध्य कर दिया है। भविष्य में भी इस प्रकार की कविताओं का इंतजार रहेगा।
आपने बहुत अच्छी कविता लिखी है। छोटा मुँह और बड़ी बात कर रहा हूँ परंतु आप इस चिट्ठे पर आलेखों के अलावा कविताओं की प्रस्तुति भी समय समय पर दिया करें।
रावण की नीयत बुरी ही पढ़ी है मैंने तो। एक ब्याहता स्त्री का अपहरण किया क्योंकि वह उससे जबरन विवाह करना चाहता था। इसे बुरा नहीं कहा जाएगा तो किसे कहेंगे जी? कदाचित् आपको रामचरितमानस पुनः पढ़नी चाहिए।
रही बात नारी की मर्ज़ी की तो यह मानता हूँ कि दोनों ही स्थितियों में(रावण-सीता और भीष्म-अंबा) नारी की स्वीकृति नहीं ली गई थी, लेकिन भीष्म ने अंबा की इच्छा का आदर करते हुए उसका विवाह जबरन अपने भाई के साथ नहीं करवाया था। अंबा की बहनों अंबिका और अंबालिका ने विचित्रवीर्य को स्वीकार किया तभी उनका विवाह उसके साथ हुआ था।
अब यह बात भी गौर करने योग्य है कि कुछ समझदार लोगों के अतिरिक्त नारी का स्थान समाज में एक वस्तु समान था जिससे व्यक्ति विशेष का मान-सम्मान जुड़ा होता था। उसको किसी के साथ भी ब्याह दिया जाता था, कोई भी उसका तिरस्कार कर सकता था और किसी वस्तु की भांति ही उसके use हो जाने पर उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता था। इसी कारण शाल्व ने अंबा का तिरस्कार करते हुए उसे लौटा दिया था।
भीष्म पर आरोप तो सारे सत्य हैं
स्वीकार है
हर सत्य
पर
भीष्म के मन के भीतर झांक कर देखने का भी प्रयास होता तो
शायद इतिहास के इस किरदार के साथ भी न्याय होता
परिवार के वयस्क पुत्रों की उच्छृंखलता और अनादर को सह कर भी अपमान सहते बुजुर्ग के दुख का एहसास यौवन और शक्ति के पंखों पर सवार युवाओं को कब हो सका है।
हम आरोप लगाने और खारिज करने में तो सबसे आगे रहते हैं पर हालातों से गुजरे बिना क्या हम वक्त और हालात को समझ सकते हैं, उसकी प्रतिक्रिया का अर्थ जान सकते हैं । बात द्रौपदी की हो या कर्ण की । जब व्यवस्था हमें केवल एक पद मान लेती है…. केवल एक निष्क्रिय पद तो हमारी आवाज का क्या मोल रह जाता है।
यह यथास्थितिवाद का पोषक होना नहीं है।
एक वक्त होता है जो बोलने की अनुमति नहीं देता।
यह पद अथवा ऐश्वर्य की लिप्सा नहीं होती , अकर्मण्यता नहीं होती ,हथियार डाल देना नहीं होता….., बस एक बेबसी होती है स्थिति को स्वीकार कर लेने की…..
आप माफ न करें पर आरोप न लगाएं ….., खारिज न करें …., आसान है किसी पर उंगली उठा देना….., आग उगल देना मगर उन जैसा कर डालना बहुत मुश्किल है।
समय करेगा उनका भी न्याय।
भीष्म को समझने के लिए आवेश की नहीं
धैर्य की जरूरत है….
कविता बहुत अच्छी है…,
विषय भी सही है,
बंधी भी अच्छी है
पर विचार पर चिंतन होता तो आवेश जरूर सार्थक होता।
@ अमित जी,
रामचरितमानस राम-कथा का सबसे लोकप्रिय काव्य भले हो, लेकिन एकमात्र और सबसे प्रामाणिक काव्य या ग्रंथ नहीं है। दूसरी बहुत-सी रामकथाएँ हैं जो उनसे पहले की भी हैं और बाद की भी। सबसे नई रामकथाओं में भगवान सिंह की ‘अपने-अपने राम’ पढ़ने का मौका कभी मिल सके तो पढ़िएगा। आधुनिक नजरिए से राम-कथा को समझने में बहुत मदद मिलेगी आपको इससे।
आपकी बातों से कुछ ऐसा लगता है कि आपने जो पढ़ लिया वही अंतिम सत्य हो गया। रावण के पक्ष को बहुत कम लोग समझ पाए, क्योंकि दुनिया केवल विजेता को सही मानती आई है। आप वैसे तो टीवी सीरियल कम ही देखते होंगे, लेकिन ज़ी टीवी पर आजकल हर शनिवार को एक सीरियल आता है, रावण। आप चाहें तो उसे देख सकते हैं, वह भी कुछ महत्वपूर्ण ग्रंथों पर ही आधारित है। राम और रावण को दूसरे नजरिए से समझने का इससे सहज तरीका शायद आपके लिए कोई और नहीं होगा। वैसे, अनूप भार्गव ने कवयित्री स्वप्न मंजूषा शैल जी की एक कविता “एकादशानन“ की एक कड़ी भेजी है, उसके मर्म को भी समझने का प्रयास कीजिएगा।
@ANUJA Ji,
Mere khayal se kavita ka prayojan yahan Krishna ke man ke aakrosh ko darshana hai, na ki Bhishm ki vivashata ko darshana. Waise, aapne sahi bindu uthaya hai. Bhishma ka paksha bhi rakha jana chahiye tha, par shayad kavita ka focus usase kahi adhik mahatvapoorna bindu par kendrit hai.
Mujhe to kavita bahut achchhi lagi.
हर कहे गये सत्य को संतुलित मन से तोलनें की कोशिश होनी चाहिये । यह कविता उसी का प्रयास है ।
अब महाभारत तो कथा ही ऐसी है कि उस की हर घटना और चरित्र पर घंटो बहस की जा सकती है । रामायण की तरह हर चरित्र सिर्फ़ अच्छा या बुरा ही नहीं हैं …… और यही शायद उस की खूबसूरती है ।
सत्य कहा। वैसे वाल्मिकी रामायण सबसे पहली राम-कथा मानी जाती है। लेकिन जितना इतिहास मैंने पढ़ा है उसके अनुसार वाल्मिकी जीवनकाल और रामायण का उत्पत्ति काल स्थापित करने वाले कोई ठोस तथ्य या प्रमाण नहीं हैं। तुलसीदास रचित रामचरितमानस को भी स्थापित इस तर्ज़ पर किया जाता है कि 16वीं सदी में अक़बर के शासनकाल में अवध में तुलसीदास नमक कवि हुआ करता था। यदि निजी दृष्टिकोण के अनुरूप कहूँ तो मैं राम-कथा, महाभारत आदि को केवल कवियों द्वारा रची कथाएँ मानता हूँ न कि वास्तविक घटनाओं का सार।
इसके बारे में मैंने अन्यत्र भी पढ़ा-सुना है। यदि आपके पास है और पढ़ने के लिए दे सकें तो बहुत खुशी होगी।
ऐसा न माने बंधुवर, ऐसा मेरा कभी अभिप्राय नहीं होता। ऐसी गलतफ़हमी यहाँ न रहे इसलिए मैं बारंबार यहाँ अपनी टिप्पणियों में “जितना मैंने पढ़ा है..” लिख रहा हूँ। क्योंकि इतना तो मुझे भी पता है कि मैंने सभी कुछ नहीं पढ़ा, इसलिए जितना पढ़ा है उसी के अनुसार अपने विचार प्रकट कर रहा हूँ।
लगभग सभी मामलों में यह बात सत्य है। शत-प्रतिशत इसलिए नहीं कहूँगा क्योंकि बहुत से ऐसे प्रकरण इतिहास में दर्ज हैं जहाँ विजेता को सही नहीं माना गया। लेकिन यह बात सही है कि विजेता ही इतिहास लिखते हैं, और आने वाली पीढ़ियाँ उसी को सत्य मानती हैं जो इतिहास में दर्ज होता है।
हाँ, इस धारावाहिक को मैं भी देखना चाह रहा था लेकिन अभी तक एक भी भाग देख नहीं पाया। समय निकाल देखने का प्रयत्न अवश्य करूँगा।
वैसे मैं यह कहना चाहूँगा कि “सही” और “गलत” मजज़ दो दृष्टिकोण हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू। और कोई आवश्यक नहीं कि दो व्यक्तियों के दृष्टिकोण आपस में मिलें।
वैसे तो हर बात के अनेक तर्क हो सकते हैं और वाग्विलास भी हम जितना चाहें कर सकते हैं पर बात तो सारी प्रयोजन की ही है। किसी भी साहित्यिक विधा का आधार केवल अपना आक्रोश या दुख व्यक्त करना मात्र हो तो उसकी आयु प्रश्नचिन्हित हो जाती है। ऐसे सुन्दर आक्रोश का अधूरेपन के साथ आना ठीक नहीं है।
रावण हो या कंस या दुर्योधन। हम आर्यों ने कभी उनके चरित्र और उद्देश्य के साथ न्याय नहीं किया। हमने कभी उनके द्वारा किए गए कामों के कारण जानने का प्रयास नहीं किए। बस अपनी बात कहते गए । अपनी नजर से उन्हें देखते गए और उनके बारे में निर्णय सुनाते गए।
पर ना तो उनकी बात को जानने का प्रयास किया न उन्हें समझने का। बस यहीं हम पक्षपाती होते गए। आज भी वही करते जा रहे हैं।
और फिर प्रयोजन में भी अपने ही पक्षधर है। हम तो अपने ही चारण् हो गए ।
ऐसे परिपक्व चरित्रों पर बात भी पूरी परिपक्वता और पूर्णता से हो तो बेहतर है।
मैं भीष्म के पक्ष से कुछ कह सकती हूं पर सोचने की बात यह है कि क्या यह पूरी बात होगी
क्या मैं भीष्म को अधूरा नहीं देख रही हूं । दरअसल तब हम पात्र की नहीं अपनी…… अपने आपके की ही अभिव्यक्ति कर रहे होते हैं……। पात्र तो केवल हमने पढा और सुना है उसको देखा नहीं जाना नहीं। हम पात्र के जीवन को नहीं देखते केवल अपनी अपेक्षाओं को बताते है। शायद हम अफसोस करते हैं कि अगर वो ऐसे होते तो शायद हमारे हीरो होते। वो इतने ऐश्वर्यवान पात्र जिनके चरित्र को हम छू भी नहीं सकते उन्हें न पा सकने का क्षोभ तो नहीं होता है यह
यह सोचने का विषय है।
बाकी कविता तो बहुत सुन्दर और समर्थ है, कवि प्रतिभाशाली।
@ अनुजा जी,
युद्ध, चाहे उसका उद्देश्य धर्म और न्याय की रक्षा ही क्यों न हो, मानवता से हिंसा पर उतारू होने की बहुत बड़ी कीमत वसूलता है और इस प्रक्रिया में मानवीय सदगुणों की उत्कृष्टता के चरम शिखर तक पहुँचे कुछ महामानवों की बलि ले लेता है। युद्ध में एक पक्ष की विजय होती है तो दूसरे पक्ष की पराजय होती है। लेकिन मानवता हर हाल में हारती ही है। भीष्म और कर्ण जैसे महामानवों की मृत्यु महाभारत के विजेताओं को भी उतना ही दु:ख पहुँचाती है, जितना कि उस पक्ष को जिसकी ओर से लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए।
यह अधूरापन ही मानवता के विकास की वह त्रासदी और विडंबना है, जिससे हम कभी उबर नहीं पाते। यह एक यथार्थ है और कवि भी इस अधूरेपन से ग्रस्त है। लेकिन जब धर्मसंकट उपस्थित हो और “दो में से तुम्हें एक क्या चाहिए” जैसा निर्णय लेने का अंतिम क्षण सम्मुख हो तब अपेक्षाकृत अधिक धर्मपूर्ण सत्य को ही उसका आधार बनाना पड़ता है।
श्रीकृष्ण को जब भीष्म और विदुर जैसे अपने दो परम भक्तों में से किसी एक को चुनना हो तो वह विदुर को चुनेंगे। उपर्युक्त कविता श्रीकृष्ण के इस निर्णय के तर्काधार पर फोकस करने का प्रयास करती है।
सबसे ऊंची, प्रेम सगाई
दुर्योधन का मेवा त्याग्यो, साग विदुर घर खाई…
विदुर किस को नही चाहिये..मगर मिलता है कया इस संसार में कही..
आप की प्रस्तुती..सुन्दर काबिले तारीफ…लिखते रहिये..हम आते रहेंगे पढने के लिये
बहुत अच्छी कविता है। महाभारत और रामायण दोनों ही बहुत से प्रश्न उठाते हैं। बहुत से महानायकों की कुछ बातें, कार्य उनपर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। ये महाकाव्य भी चित्र का एक ही पहलू दिखाते हैं और कुछ ऐसा दर्शाते हैं कि विजेता सदा सही होता है। या शायद वे यह बताना चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति, चरित्र परिपूर्ण नहीं होता, चाहे वह नायक ही क्यों न हो। शायद जानबूझ कर इन चरित्रों में कुछ न कुछ कमी छोड़ दी गयी यह दिखाने के लिये कि मनुष्य कभी भी पूर्ण या निर्दोष नहीं हो सकता चाहे वह तथाकथित भगवान का अवतार ही क्यों न हो। हो सकता है ये हमें हमारी अपूर्णताओं के साथ जीने या हमारी कमजोरियों को सहने के लिये ये दिखा रहे हों कि देखो कोई भी पूर्ण नहीं है।
वैसे भी गंगापुत्र की जिस प्रतिज्ञा के कारण कुरु वंशज पैदा हुये वह प्रतिज्ञा व उसके कारण भी आज के इस मनुष्य की समझ व वात्सल्य से बाहर हैं। आज का अदना सा मनुष्य भी अपनी संतान के सुख को ताक पर रख अपना विवाह नहीं रचायेगा। वह अपनी संतान के लिये त्याग करता है न कि संतान से त्याग की आशा रखता है। जिस महाभारत के लगभग सभी मूल पात्र पिता की कामेच्छा के लिये पुत्र के विचित्र त्याग की उपज हों वहाँ सब कुछ जायज लगता है।
मैं मूल विषय से कुछ भटक तो गयी किन्तु मुझे लगता है कि सभी महाकव्य मनुष्य की अपूर्णता को ही दर्शाते हैं। भीष्म कोई अपवाद नहीं।
फ़िर जिस द्रोपदी को माँ के मुख से निकले वचन पूरे करने के लिये पाँच भाई बाँट लें, जिसे जुए में स्वर्ण मुद्राओं के स्थान पर लगा दिया जाये उस द्रोपदी का क्या मान क्या महत्व ? सो भीष्म भी चुप रहे तो क्या आश्चर्य ?
- घुघूती बासूती
blog ko rich karne par sochna chahiye. pure sahitya mein hi khaskar kavita mein to update rahna padta hai. kisne kya likha hai yah janana to hai hi jaruri, kaisa likha ja raha hai hamare samay mein wah hai anupexniya. ummid hai awsar ka sadupyog hoga.
Srijan Shilpi ji,
Aapki kavita achchhi hai. Kavita ka vishay aur vichaar to achchha hai lekin kuchh-kuchh kami khal gayee. Mera vichaar hai ki kavita sirf shabda sanyojan aur vichaaron ki bhaavavesh me ki gayee bayanbazi nahi hoti. Kavita koi bhashan bazi bhi nahi hoti balki kavita aur bhi bahut kuchh hoti hai jiska aapne dhyan rakha hota to shaayed theek hota. Yedi aur gambheerta se soch samajh kar likhi jati to kavita behtar bankar aati. Aapko meri badhayee aur aage likhte rehne ke liye shubhkaamnayen.
aapka hi
anuj
सृजन शिल्पी जी..
नमन आपको। मेरी कविता “धर्म और राजनीति” पर आपने जो टिप्पणी की है वहीं से इस कविता का पता मिला। आपके सवालों ने झकझोरा है, कविता नितांत समसामयिक है, पुरातनता की ओट में आज की व्यवस्था को आपने ठोकर मारी है। बहुत गंभीर रचना। विषेशकर ये पंक्तियाँ पसंद आयीं..
आप स्वेच्छा से चले जाइए।
आप सड़ी-गली व्यवस्था के पोषक हैं
आप व्यवस्था से अंधों की तरह बंधे हुए हैं
व्यवस्था आपको नचा रही है
व्यवस्था के आप गुलाम हैं
व्यवस्था के इशारे पर आप हर कुकर्म करने को राजी हैं
व्यवस्था के हर कुकृत्य के आप मूक साक्षी हैं, सहयोगी हैं
आप धन्य हैं, आपको धिक्कार है!
*** राजीव रंजन प्रसाद
सृजन जी.. पढ़िए तो अच्छी लगती है कविता… लेकिन उद्देश्य कहीं इतिहास को डंडे पर उठाकर कुछ और करने की तो नहीं?
फिर भी सवाल हैं और अच्छे हैं.. कठघरे में खड़ा किया.. तो गलत भी नहीं.. लेकिन कोई जब कठघरे में खड़ा हो और उस पर आरोप लगाया जा रहा हो .. तो इतने भर से कोई दोषी नहीं हो जाता भाई.. सजा से पहले अदालत मुलजिम से उसका जवाब भी सुनती है … लेकिन आपका आरोपी तो है नहीं.. जवाब कौन देगा..!
@ अमित,
यही तो मेरी आकांक्षा थी कि भीष्म के पक्ष को कोई सशक्त ढंग से प्रस्तुत करे। राजीव की कविता काफी हद तक ऐसा करती भी है। इसके लिए भीष्म को साक्षात होने की जरूरत नहीं, भीष्म के पक्ष को, उनके भावों-विचारों को, उनके तर्कों और स्वीकारोक्तियों को कोई कवि भी बखूबी बयां कर सकता है।
कठघरे में अकेले भीष्म खड़े नहीं हैं, वे सभी हैं जो भीष्म-वत आचरण करते हैं, धर्मसंकट के समय गलत निर्णय लेते हैं, गलत पक्ष का साथ देते हैं, अन्याय का प्रतिकार करने के लिए आगे नहीं आते, जुल्म के समय मौन और तटस्थ रहते हैं। इतिहास तो प्रश्न खड़ा करता ही है और कविता भी पोएटिक जस्टिस चाहती है और उसे अपने हिसाब से हासिल करने का प्रयास भी करती है।
सृजन शिल्पी…
विषय के जिस भाव को आपने पकड़ा है, उसे बेहद खूबसूरती से व्यक्त किया है… कहने का अर्थ यह है कि यदि सिर्फ़ भाव ही देखे जाएं तो कविता निश्चय ही बेहतरीन है…
भीष्म के गुण-अवगुण और परिस्थितियों के बारे में न सोचकर यदि सिर्फ़ वही देखा जाए, जो इस कविता का उद्देश्य मुझे लगा, तो सचमुच आज विदुर की ही आवश्यकता है, लेकिन हा, वह सम्भव नहीं दिखता…
बहरहाल, अभिव्यक्ति में कमाल कर देने के लिए बधाई…
विवेक रस्तोगी
@ विवेक रस्तोगी जी, आपके सुन्दर शब्दों के लिए आभार !
great writing
I am writing to & I will send u some of my works soon.
Bhishm par nai driti dene k liye thanks