व्यस्तता की वजह से कुछ दिनों से मुझे कोई पोस्ट लिख सकने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया, इसलिए इस दौरान चिट्ठों को पढ़ते हुए जहाँ कहीं जरूरी लगा, मैंने त्वरित टिप्पणी के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया देकर काम चलाने की कोशिश की। लेकिन ऐसा लगता है कि उन टिप्पणियों की प्रतिक्रिया में कुछ गुबार-सा उठा है जिसकी गर्द को साफ करने की कोशिश में यह पोस्ट लिखने जा रहा हूँ। मुझे नहीं मालूम कि इस पोस्ट से गर्द साफ होगी या कुछ लोगों के मन में बद्धमूल हो चुकी गंद बाहर आने के लिए मचल उठेगी। बहरहाल, जो भी हो, मैं तो मुक्तिबोध के इस ध्येय को धारण करने वाला व्यक्ति हूं कि “जैसी दुनिया है उससे बेहतर चाहिए, सारा कचरा साफ करने को मेहतर चाहिए।” अपने ऑनलाइन लेखन के लिए मेरा ध्येय वाक्य मुक्तिबोध की इसी पंक्ति को अपने ढंग से अनुकूलित करते हुए अपनाया गया है, “जैसी दुनिया है उससे बेहतर चाहिए। बेहतर दुनिया के लिए बेहतर इंसान चाहिए।”
मेरी पिछली पोस्ट 11 मार्च, 2007 को नई दिल्ली के कनाट प्लेस में हुई चिट्ठाकारों की बैठक पर समापन रपट के संबंध में थी, जो ‘चिट्ठाकार सम्मेलन’ पर पोस्ट की गई थी। उस रपट में मैंने बैठक में हुई कुछ महत्वपूर्ण किंतु गंभीर-किस्म की चर्चा को जानबूझकर शामिल नहीं किया था और उसके बारे में लिखना कुछ कारणों से आज तक स्थगित ही है, और शायद अब वह जरूरी भी नहीं रह गया है।
मेरी उक्त रपट में उल्लिखित एक तथ्य के बारे में चिट्ठाकारों की बैठक में शामिल रहे एक साथी ने एक अश्रुतपूर्व टिप्पणी की, जिसे उनकी भावना का ध्यान रखते हुए मुझे मिटा देना पड़ा। आम तौर पर मैं अपनी पोस्टों पर आने वाली किसी भी टिप्पणी को मिटाता नहीं, चाहे वह मेरे संबंध में कितनी ही अप्रिय भाषा में लिखी गई हो। टिप्पणियों को मैं चिट्ठाकारी के लोकतंत्र का प्राण मानता हूँ। यही वजह है कि मेरे मन में अपने चिट्ठे पर कभी टिप्पणियों के लिए मॉडरेशन का विकल्प लागू करने का विचार नहीं आया, जबकि पिछले एक वर्ष के दौरान कई बार मेरा चिट्ठा हिन्दी चिट्ठाकारों के बीच कई मुद्दों पर हुई घमासान बहस का कुरुक्षेत्र भी बना है। इससे पहले केवल एक बार एक अनाम साथी की टिप्पणी मुझे इस वजह से हटानी पड़ी थी, क्योंकि आरक्षण के मुद्दे पर मेरी एक पोस्ट पर उस अनाम टिप्पणीकर्ता ने किसी अन्य टिप्पणीकर्ता के बारे में अशोभनीय शब्दों का प्रयोग किया था।
ज्यादातर चिट्ठाकार अवगत होंगे कि मैंने विवादास्पद और संवेदनशील विषयों पर लिखने से भी परहेज नहीं किया और इस तरह का लेखन करते समय कभी इस बात की परवाह नहीं कि दूसरे लोग मेरा समर्थन करेंगे या विरोध। तथ्यों और जानकारियों के विश्लेषण के आधार पर मुझे जो सही लगा उसे सबके सामने रखने में कभी हिचक महसूस नहीं हुई। यही वजह है कि जब 25 जनवरी, 2007 को चिट्ठा चर्चा करते समय समीर लाल जी ने अपने चिर-परिचित व्यंग्यात्मक शैली में यह कहने की कोशिश की कि हमें ऐसे विषयों पर लिखने से बचना चाहिए जिन पर विवाद पैदा हो सकने की आशंका हो, तब मैंने उनका तीव्र प्रतिवाद किया था। मैं चिट्ठा जगत में सेंसरशिप के हमेशा खिलाफ रहा हूँ। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे पर मेरी आवाज भी हमेशा मुखर रही है।
चिट्ठाकार बैठक की समापन रपट संबंधी उक्त पोस्ट पर आई एक ‘साहसिक’ टिप्पणी पर जब मेरी नजर पड़ी तो मुझे उसकी तह में जाना जरूरी लगा। उस टिप्पणी में जो कहा गया था, उसके प्रासंगिक (संपादित) अंश निम्नानुसार हैं :
आपकी रपट पढ़ी, और कई नए तथ्य भी,
जी कई नए ‘तथ्यों’ पर प्रकाश डाला, मसलन ये घोषणा ही कर डाली कि ……… अब हम तो सहर्ष इसे स्वीकार कर लें (पहले कोशिश कर चुके हैं) पर मुझ जैसे औघड़ से ………. आप अपने लिए मान हानि का मुकदमा आमंत्रित कर रहे हैं …….। वैसे आपकी ‘जानकारी’ का स्रोत जरा मेल करें मुझे।
मैं भारतीय संविधान और क़ानूनों का बुनियादी ज्ञान रखने वाला नागरिक हूँ और पेशेवर पत्रकार भी रहा हूँ और संयोग से, कुछ वर्षों से क़ानून से ही संबंधित पेशे में कार्यरत हूँ। उक्त टिप्पणी दोनों विधाओं में मेरी क्षमताओं की परीक्षा के लिए एक चुनौती के रूप में सामने थी। यह टिप्पणी मेरे द्वारा उल्लिखित जिस तथ्य के संदर्भ में आई थी, उसका जिक्र मैंने अत्यंत हर्षित भाव से किया था और उसकी सत्यता के बारे में बैठक में उन मित्रों को आमंत्रित करते समय 99 फीसदी तक आश्वस्त भी था। यह जरूर है कि उनकी टिप्पणी आने से पहले तक मैंने प्रत्यक्ष तौर पर उसकी पुष्टि नहीं की थी, क्योंकि ऐसी जरूरत महसूस नहीं हुई थी। मैं इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ था कि चिट्ठाकारों की बैठक में कुछ साथी मुखौटे पहनकर आए थे और वे अपने बारे में कुछ रहस्य बनाकर चल रहे थे। लिहाज़ा, उनकी टिप्पणी मिलने के बाद अपने लिखे पर एक फीसदी संदेह की गुंजाइश देखते हुए मैंने अगले ही मिनट पोस्ट में आवश्यक संशोधन कर दिया और यथासंभव विनम्रता के साथ क्षमायाचना करते हुए एक मेल उक्त साथी को भेज दी, जिसका मज़मून इस प्रकार है:
भाई साहब,
यदि यह मेरी ग़लतफ़हमी थी तो वाकई एक घोर आपत्तिजनक गलती थी। मैं स्वीकार करता हूँ। ….
मेरी ग़लतफ़हमी के मूल में आपकी कुछ पोस्टें और टिप्पणियाँ रही हैं ……
मैं चिट्ठे पर भी इसे स्वीकार करते हुए क्षमायाचना कर रहा हूँ।
प्रार्थना है कि आपकी …… भावनाओं को जो ठेस पहुंची, उसके लिए मुझे माफ कर दें। अन्यथा जो भी सजा देना चाहें, मैं भुगतने को तैयार हूं।
मेल के प्रत्युत्तर में उन मित्र ने लिखा :
आप कृपया क्षमायाचना न कर इसे स्वयं विस्मृत होने दें। हो सके तो विष्लेषण से इसे हटा लें बस। यानि इसे पब्लिक डोमेन में न लाएं, इतना काफी होगा।
यह उत्तर उलझाने वाला था। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि मैंने जिस तथ्य का उल्लेख किया था, वह वास्तव में गलत था या नहीं। यदि तथ्य सही था और आपत्ति केवल इस बात पर थी कि उसे पब्लिक डोमेन में न लाया जाए तो फिर मानहानि की धमकी किसलिए दी गई थी? वह भी एक ऐसी बात के लिए जिसे जानकर आप हैरान हुए बगैर नहीं रहेंगे। मेरे लिए यह जानना जरूरी हो गया था कि आख़िर माजरा क्या है। लिहाज़ा, मैंने अपने सूत्रों का इस्तेमाल करते हुए सच को जानने का प्रयास किया और एक दिन बाद सारी स्थिति मेरे सामने स्पष्ट थी। उस तथ्य के उल्लेख के बारे में मैं शत-प्रतिशत सही था। लेकिन, मुझे यह समझ में नहीं आ सका कि उस तथ्य के उल्लेख का इतना बुरा क्यों माना गया। फिर भी, मैंने बात को आगे बढ़ाना मुनासिब नहीं समझा और इस बारे में खामोश ही रहा।
अगले ही दिन उसी मित्र ने चिट्ठाकारों का आह्वान करते हुए एक पोस्ट लिखी, आइए रचें हिन्दी का मौलिक चिट्ठा शास्त्र, जिसमें कहा गया था कि:
इधर चिट्ठाकार मित्रों में अलग अलग अनुपात में एक आचार संहिता के लिए उत्साह देखने में आया है। कुछ मित्र मसलन सृजन, अमिताभ आदि मिशनरी रूप से इसके पक्षधर हैं तो कुछ असमंजस में ही सोच रहे हैं कि मोहल्ला प्रकरण के आलोक में शायद ये जरूरी है। चूँकि मौन को स्वीकृति मानने की नाजायज सी परंपरा सागर शुरू कर चुके हैं इसलिए मुझे लगा कि जो मानसिक कवायद हमने की है उसे साझा किया जाए। अविनाश और अन्य लोगों से जो छुटपुट चर्चा रविवार को हुई थी उसमें और अन्यथा भी मुझे अक्सर लगा है कि हिंदी चिट्ठाकारी के लोग स्वयं को चिट्ठाशास्त्र (ब्लॉग थ्योरी) से अलगा कर एक नई दुनिया बना रहे हैं।
उक्त उद्धरण में मेरा संदर्भ गैर-जरूरी और अनुचित रूप से दिए जाने के बावजूद मैंने उसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं की। बैठक में जो चर्चा हुई थी, उसके बारे में मैंने कुछ लिखा भी नहीं था। हाँ, बैठक में शामिल कुछ अन्य साथियों ने जरूर अपनी रपट में सांकेतिक रूप से इसका जिक्र किया था, जिसपर मैंने कोई प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं की थी। अगले दिन फिर एक अन्य नवोदित चिट्ठाकार की पोस्ट पर मेरी बातों का संदर्भ कुछ इस प्रकार से था:
जीतु जी, स्रिजन जी व अन्य कुछ लोगो ने भी कहा “इस तरह के मेल जोल से आम सहमति बनाई जा सकती है और आचार सहिता बनाइ जा सकती है” यह दोनो ही बाते ब्लागिन्ग के उद्देश्य को खत्म करने वाली है।
अब मुझे उत्तर देना जरूरी लगा। सो मैंने टिप्पणी की:
….पहले यह बताओ कि मैंने ये उपर्युक्त उदगार कहाँ व्यक्त किए। जहाँ तक मुझे ध्यान है कि मैंने यह बात या इस आशय की कोई बात कहीं नहीं लिखी है। ब्लॉगर मीट में कुछ बातें मैंने जरूर उठाई थी और उनपर (बैठक में शामिल) साथियों की राय जानने का प्रयास किया था। लेकिन आप तो वहाँ थे नहीं। यदि होते तो समझ सकते थे कि इस मुद्दे पर आम सहमति की कोई अपेक्षा मैंने नहीं की। लेकिन (बैठक में शामिल) साथी चिट्ठाकार इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं, यह जानना चाहता था। मैं इस विषय पर समय मिलते ही अवश्य लिखूंगा, जैसा कि मैंने वायदा भी किया है।
दूसरी बात, जो आपका भ्रम दूर करने के लिए बताना जरूरी है कि न्यूनतम आचार संहिता का प्रस्ताव हिन्दी चिट्ठाकारी के आम संदर्भ में नहीं, बल्कि नारद के विशेष संदर्भ में है। ऐसे बहुत से चिट्ठे हैं और हो सकते हैं जो नारद पर पंजीकृत न हों। हम उनकी बात नहीं कर रहे।
तीसरी बात, यदि आप भारतीय हैं, भारत में रहते हैं और भारत के संविधान को मानते हैं तो आप संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत दिए गए वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार के साथ जुड़ी शर्तों को कदापि नहीं भूल सकते। वे शर्तें कुछ इस प्रकार हैं – अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता, भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में लगाई गई पाबंदियों के अध्यधीन है।
आपको बोलने की आजादी है, लेकिन आपको इस स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए किसी पर व्यक्तिगत प्रहार करने की आजादी नहीं है। जो बात बैठक में मैंने रखी थी कि हमलोग मुद्दों पर फोकस करते हुए बहस करें, लेकिन आपस में किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार न करें। यदि ऐसा आवेश, उत्तेजना या अनजाने में किसी से हो जाए तो अन्य साथियों द्वारा ध्यान दिलाए जाने पर अपनी भूल स्वीकार कर ले।
यदि आपकी सोच इससे भिन्न है तो फिर आप वाकई स्वतंत्र हैं, अंतर्जाल पर उन्मुक्त विचरण करने और विचार-वमन करते रहने के लिए। …कीजिए। आप आलोचक जो ठहरे। कोई होगा जो आपका भी उस्ताद होगा इस खेल में। फिर आप उसे रोक लीजिएगा!
मेरे अलावा कई अन्य साथियों ने भी उस पर टिप्पणी की थी। इन टिप्पणियों पर उस मित्र ने, जिन्होंने पहले मुझपर मानहानि का मुकदमा करने की धमकी दी थी (उस पोस्ट के लेखक ने नहीं, जिसकी बातों पर हमलोगों ने टिप्पणी की थी), जो प्रति-टिप्पणी की उसकी कुछ पंक्तियों की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ:
शांत भीम (सृजन) शांत
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और संविधान …हुम्म्म्म अच्छी किताब है। पढ़नी चाहिए। सरकार छापती है…सत्तर रुपए।
वैसे हे अबूझ पहेली ये आपने कैसे बूझा कि आलोचक वहॉं नहीं थे, वे तो गुमनाम हैं, शायद रहे हों वहीं।……
अगले दिन उस मित्र ने एक और पोस्ट दागी, जिसमें उन्होंने अपने बारे में यह खुलासा करते हुए कि “मुझे मुखौटा आजाद करता है” एक जानकारी दी कि “इस चिट्ठाकारी की दुनिया का दस्तूर ही है कि यहाँ मुखौटा लगाकर रहा जाता है…मुखौटा यहाँ का अजूबा नहीं है।” उन्होंने आगाह किया कि “ध्यान दें कि खतरा यह है कि यदि आप इसे वाकई मुखौटों से मुक्त दुनिया बना देंगें तो ये दुनिया बाहर की ‘रीयल’ दुनिया जैसी ही बन जाएगी – नकली और पाखंड से भरी।”
अपनी बात के समर्थन में उन्होंने एक काल्पनिक पौराणिक कहानी के अलावा अपनी बेटी की एक ड्राइंग तथा सुनील दीपक जी की एक टिप्पणी का भी जुगाड़ू इस्तेमाल किया।
मैंने सोचा कि इन्हें मुखौटों का खेल खेलने में मजा आता है तो खेलने दो। मैं उनके मुखौटे के पीछे की सच्चाई को पहले ही जान चुका था, इसलिए उस लेख को पढ़कर मुस्करा कर रह गया। इस बीच कुछ और मुखौटे भी, जो पहले से सक्रिय थे, इस खेल में खुलकर शामिल हो चुके थे, जिनमें से धुरविरोधी नाम का मुखौटा खास तौर पर उल्लेखनीय है। मुझे उनकी दिलचस्प बातों में ठोस सचाई नजर आती थी, इसलिए उनके लेख मैं चाव से पढ़ता भी था। इसलिए उत्सुकतावश उनके बारे में थोड़ी-बहुत छानबीन की और उनकी असलियत का पता चल गया। लेकिन मैंने देखा कि उनके भीतर उस तरह की कुटिलता का भाव नहीं है जैसा कि मुखौटा पुराण के प्रतिपादक महोदय का दिख रहा था, सो मैंने उनकी पोस्ट पर एक टिप्पणी की, जिसे उन्होंने मेरी तरफ से ‘क्लीन-चिट’ मान लिया:
भले ही मुझे सच बोलने के लिए कभी मुखौटे की जरूरत महसूस नहीं हुई और अनाम रूप से कहीं टिप्पणी करने की नौबत भी नहीं आई है। जैसा कि आप कहते हैं कि मुखौटे की आड़ में सच बोलना आपको सुविधाजनक लगता है, जब तक आप सच बोलते हैं, तब तक किसी को आपके इस खेल से भला क्या आपत्ति हो सकती है। अब तक आपने धुरविरोधी के मुखौटे के पीछे छिपकर जिस अंदाज में सच बयान किया है, उस तरह के सच को पढ़ने के लिए तो मैं बारंबार आपके चिट्ठे पर आना चाहूंगा। आपके साथ इस खेल में जो राजदार साथी शामिल हैं, उनके अलावा भी कुछ लोग हैं, जो आपको पहचानते हैं और मुखौटे के पीछे के सच्चे इंसान से प्यार करते हैं। लेकिन कमीनेपन से मुझे नफरत है और उसके प्रति मैं निर्मम हूं। लेकिन यदि कोई अपने ब्लॉग पर कमीनापन भी दिखाए तो मैं उसका मैं क्या बिगाड़ सकता हूं, सिवाय इसके कि उसके ब्लॉग पर आना बंद कर दूं।
एक हिन्दी फिल्म आई थी, अग्निवर्षा–जिसमें एक पौराणिक कथानक का फिल्मांकन किया गया था। उस कथानक में नाटक के पात्रों द्वारा लगाए गए मुखौटों में अचानक जान आ गई थी और फिर मुखौटे नाटक के पात्रों की भूमिका रहे व्यक्तियों पर हावी हो गए और उनसे वही सब करवाने भी लगे और फिर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और रंगमंच को श्मशान में तब्दील होते देर नहीं लगी। मुखौटे के खेल में दिलचस्पी लेने वाले चिट्ठाकारों को ध्यान रहे कि कहीं उनके मुखौटे उनपर हावी न हो जाए और उनको सर्वनाश की तरफ न ले जाएँ।
सच बोलने के लिए किसी मुखौटे की जरूरत महसूस नहीं होती, यह एक उदाहरण से दर्शाने के लिए मैंने उनकी अगली पोस्ट पर, जो कि हिन्दुस्तान टाइम्स में हिन्दी चिट्ठाकारी के संबंध में छपी ख़बर के बारे में थी, एक और टिप्पणी की:
ख़बर प्रायोजित थी, यह तो पढ़ कर ही लगता है। आजकल ज्यादातर ख़बरें ऐसी ही होती हैं। धुरविरोधी जी, आपने यह बात खूब कही कि “नीलेश भईय्या, जब कभी लिखा करो तो थोडा आखें भी खोल लिया करो. दोस्ती यारी तो चलती ही रहती है।” लेकिन आप यह भी देख सकते हैं कि यह बात मैं बगैर किसी मुखौटे के कह सकता हूं। इस ख़बर को प्रायोजित करने वालों और उसे प्रकाशित करने वालों के साथ तमाम व्यक्तिगत संबंधों के बावजूद। जिस अख़बार में यह ख़बर छपी है उसमें खुद काम कर चुका हूं और जिन लोगों ने इसे प्रायोजित करवाया है, उन्हें भाई की तरह मानता हूं। क्या सच कहने के लिए वाकई किसी मुखौटे की जरूरत होती है?
अगले दिन दो-तीन पोस्टें और दिखीं, जिनमें से एक तो उसी आलोचक नामक मुखौटे के द्वारा पोस्ट की गई थी और दूसरी धूमकेतु टाइप के एक नए चिट्ठाकार की पोस्ट थी जो उन्होंने ‘शुरुआती झटका’ देने के लिए लिखी थी। एक अन्य पोस्ट भी थी जिसमें यह खुलासा किया गया था कि मैं आपके लिए नहीं लिखता । इन सभी पोस्टों में किसी कथित ‘आचार-संहिता’ का हवाला देते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन के प्रयासों के विरोध में बिगुल बजाने का उत्साहपूर्ण प्रयास किया गया था। इस बिगुल के साथ उसी दिन तुरही बजायी थी हमारे वरिष्ठतम सक्रिय चिट्ठाकार रवि रतलामी जी ने अथ श्री उत्तम आचार संहिता नामक अपना व्यंग्यात्मक लेख लिखकर। इस मुखौटा-पुराण और आचार संहिता संबंधी बकवाद से उपजे कोलाहल भरे माहौल से मुझे ऊब होने लगी थी, सो अब इस प्रकरण का पटाक्षेप करने की गरज से मैंने आलोचक के पोस्ट पर एक टिप्पणी की, (जो असावधानीवश एक अन्य धूमकेतु चिट्ठाकार की पोस्ट पर भी पेस्ट हो गई) :
ये समझ में आता है कि हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने और उसमें शोध करने और कराने वालों के लिए घिस-पिट के अप्रासंगिक हो चुके विषयों की नीरसता से बचने के लिए ऑनलाइन हिन्दी की तरफ रुख़ करना जरूरी हो गया है। लेकिन हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रयोजन और प्रकृति को ढंग से समझे बगैर और ख़ुद उसमें गहरे उतरे बगैर आप लोग इतने पंडिताऊ ढंग से बातें करने लग जाते हो, यह मेरी समझ में नहीं आता। आपलोगों को मुखौटे लगाने का शौक है, लगाओ। लेकिन अपने इरादे साफ करो, गैंगबाजी मत करो। मेरी जानकारी में कोई ऐसी आचार-संहिता नहीं बनी है और न ही उसकी बात कहीं की गई है, जिसको लेकर आपलोग इतनी हाय-तौबा मचाए जा रहे हो।
मजे की बात यह है कि इस पर प्रति-टिप्पणी मुझे आलोचक के चिट्ठे पर मिलने के बजाय उस धूमकेतु चिट्ठाकार के चिट्ठे पर मिली, जिसमें मुझ पर फिर कुछ इस अंदाज में कुटिल व्यंग्य करने का प्रयास किया गया था:
देखिए आचार संहिता रविजी ने बना दी है। सृजन जी यहॉं वहॉं मत पूछो कहॉं कहॉं संतोषी मॉं की तर्ज पर उसका पालन भी कर रहे हैं। लेकिन हम तो उसी विश्वविद्यालयी भाषा में जारी रहने वाले हैं।
ये तकनीक वकनीक से जासूसी छोड़ लोग क्यों नहीं किसी रचनात्मक काम में ऊर्जा लगाते।
अब तक की राम-कहानी मैंने आपको ज्यों-की-त्यों सुना दी। सारे तथ्य सिलसिलेवार ढंग से रख दिए। लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि हे मुखौटाधिपति महोदय, आप मेरी ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों के लिए बचने दें, तब न मैं जासूसी छोड़कर कुछ सार्थक किस्म का काम कर सकूं। अब देखो न, आपके कारण मुझे इतनी लंबी पोस्ट लिखने में कितनी ऊर्जा व्यर्थ गँवानी पड़ी। इतने समय में तो मैं नेताजी पर लेख-शृंखला की अगली पोस्ट लिख सकता था। वैसे, मुझे मालूम है कि हिन्दी चिट्ठाकारी के भरतमुनि, भामह बनने चले इस ….. किस्म के मुखौटे के समर्थन में तमाम बुजुर्ग चिट्ठाकार उमड़े चले आएंगे और यदि कोई दूसरा नहीं आएगा तो एक ही परिवार में कई मुखौटे तो हैं ही पहले से, साथ देने के लिए।
(नोट – यदि रवि रतलामी जी द्वारा प्रस्तावित आचार संहिता को चिट्ठाकारों का अनुमोदन प्राप्त हो गया हो तो मैं उन मुखौटा शिरोमणि चिट्ठाकार-व्याख्याता से कहना चाहता हूं कि हे दुर्योधन ! तुमने ‘भीम’ की संज्ञा मुझे दी है, गदा का स्वाद चखने का मन कर रहा है क्या? गुरुजनों ने मुझे “शठे शाठ्यम समाचरेत” का उपदेश दिया है। सोचता हूं कि उस पर अमल कर ही डालूं।)
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मैंने इसे पढ़ा। लिंक न होने के बावजूद काफ़ी कुछ समझ भी गया कि किसके लिये क्या कहा गया है। लेकिन मुझे अब भी लगता है यह सब काम करने के बजाय अपने लेखन का काम करो। इन घटनाऒं से जो जुड़े नहीं हैं वे इसे समझ नहीं पायेंगे, जो जुड़े हैं उनको बताना क्या?
यह मेरा अपना मत है कि यह पोस्ट लिखने से बचना चाहिये। बाकी तुम्हारी मर्जी।
सृजन भाईसाहब मैं समझ नहीं पा रहा कि इस मुद्दे पर क्या कहूँ। इस विवाद के विषय में नहीं जानता अतः अपनी राय देने हेतु उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ। लेकिन मेरा भी मानना है कि इस तरह के मामले व्यक्तिगत स्तर पर ही निपटा लिए जाने चाहिए। अब मुझे इस सारे प्रसंग की जानकारी तो नहीं लेकिन पोस्ट से अंदाजा लगा कर यह कह सकता हूँ कि अगर कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत मामलों पर बात किया जाना पसंद नहीं करता तो उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए।
बाकी मुखौटों और आचार संहिता संबंधी आपने अपनी राय सपष्ट रुप से व्यक्त की तो वह उचित है। हम सबको अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है।
मुखौटों के बारे में मेरा कोई विशेष मत नहीं लेकिन आचार संहिता के बारे में शायद अपनी राय व्यक्त करूं।
अनूप जी के कथन में दम है।
सुबह सुबह औफिस जाने की तैयारी ना कर आपकी पोस्ट पढ़ने बैठ गया और अपना नया नामकरण “धूमकेतू” पाया….लगा जैसे “दो बैलों की लड़ाई में बेचारी घास” पिस रही है .. तो ऎसे करते हैं आप नये चिट्ठाकारों का स्वागत .. जानकर खुशी हुई.
kakesh
आपने अपने मन की बात लिखी, यह अच्छी बात है. बाकी, इन विघ्न-संतोषी लोगों पर पोस्ट बरबाद करना उचित नहीं.
अच्छा लिखा है.
अपनी खोज-बीन सुभाषबाबू पर लगाएं, अच्छा कार्य है.
वैसे यह पोस्ट बेकार नहीं गई है
सृजन जी,
आप रचनात्मक व्यक्ति हैं, आप अपना ध्यान लिखने मे लगाएं, कहाँ इन सब चक्करों मे पड़ गए? इत्ता बड़ा लेख लिख डाला, आधा पल्ले पड़ा आधा नहीं। ख़ैर, जानने की जरुरत भी नहीं। मेरा तो यही मानना है कि द्विपक्षीय मुद्दे ब्लॉग पर लिखने की बजाए, आपसी बातचीत से सुलझा लिए जाने चाहिए।
वैसे, आपके इस लेख के बाद आपके न चाहते हुए भी मुखौटा परिवार अब अज्ञात नहीं रह गया है।
मै भी अनूप जी का आंख मूंद कर समर्थन कर रहा हूं !
अनूप शुक्ला जी, जीतू भाई और संजय भाई की टिप्पणी को कॉपी-पेस्ट कर लेवें, मेरे विचार आपके सामने होंगे।
यानी मैं भी इन सबसे सहमत हूँ और आपसे भी।
मेरी समझ में एक ही उपाय आता है, जो सभी अबुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों को अपना लेना चाहिये, अपने चिठ्ठे के विषयों को कविता, चुटकुलेबाजी, सिनेमा और तकनीकी विषयों पर सीमित कर लें और साथ ही इनके अतिरिक्त किसी भी गंभीर विषयक चिट्ठे पर टिप्पणी न करे, क्योंकि समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र या अर्थशास्त्र (और हिन्दी) जैसे विषयों में पीएच.डी. किये बिना बुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों के चिट्ठे पर टिपियाना आ बैल मुझे मार की कहावत को चरितार्थ करेगा। बुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों के तर्कों-कुतर्को का हमारे पास या तो सटीक जवाब होगा नहीं, अगर देने की कोशिश की तो चिट्ठाकारी के भरतमुनि, भीष्म पितामह , भामह सभी हड़काने आयेंगे कि शांति शांति !
लगता है कि कुतर्क , वैमनस्यकारी भाषणबाजी और चारित्रिक दोहरेपन का विरोध अब संज्ञेय अपराध हो गया है!
@ काकेश जी (धूमकेतु)!
मेरी टिप्पणी से आपकी संवेदना आहत हुई, इसके लिए मुझे खेद है। (मैंने आपकी कविता भी पढ़ ली है और वहां भी यह टिप्पणी की है) लेकिन आप खुद ही सोच कर देखें कि आपने चिट्ठा लेखन की शुरुआत “शुरुआती झटके” श्रेणी के अंतर्गत पोस्ट लिखकर की और विषय भी विवादास्पद चुना और लहज़ा भी कुछ ऐसा, जिसमें नवागत-सुलभ विनम्रता के कोई संकेत नहीं थे। जिस विषय की पृष्ठभूमि से आप भलीभांति अवगत न हों, उसपर भिड़ने के लिए आप ताल ठोंककर मैदान में उतर आएं तो फिर आपको कुछ सुनने के लिए तैयार भी रहना चाहिए। आपकी आपत्ति यही थी न कि चिट्ठाकारों के लिए ऐसी कोई आचार-संहिता नहीं होनी चाहिए जिसमें एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने पर कोई प्रतिबंध लागू हो। यदि आप व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने को सही ठहराए जाने का पक्ष लेते हैं तो फिर आपके आहत होने का तुक समझ में नहीं आता।
कोई नया चिट्ठाकार यदि इस तरह से शुरुआत करे तो कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि वह इरादतन ऐसा कर रहा है। चाहे वह अपनी तरफ सबका ध्यान आकर्षित करने के लिए कर रहा हो या फिर किसी से प्रेरित होकर ऐसा कर रहा हो। ‘धूमकेतु’ शब्द का प्रयोग मैंने किसी व्यंग्यात्मक अर्थ में नहीं किया था, वह सिर्फ लक्षणात्मक संबोधन था। धूमकेतु के लक्षण भी कुछ ऐसे ही होते हैं। यदि आप ऐसे नहीं हैं तो फिर अन्य आकाशीय पिंडों की तरह नियमित कक्षा में ही परिभ्रमण करें, बेहतर होगा।
लेकिन यदि आपको विवादों में उलझना पसंद है और चिट्ठा जगत में एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने को भी सही मानते हैं, तो फिर इस तरह की छोटी-छोटी बातों पर आहत मत हों। आप तो घोषणा कर ही चुके हैं कि आपको चिट्ठा जगत की ‘राजनीति’ समझनी है और यहां के ‘मगरमच्छों’ से निपटना है! यह भी रेखांकित कर रहा हूं कि कुछ पुराने चिट्ठाकारों के लिए (जिसमें आप शायद मुझे भी शामिल करके चल रहे हैं) ‘मगरमच्छ’ शब्द का प्रयोग करने की पहल आपने ही की थी। उसके बाद ही मैंने आपके लिए ‘धूमकेतु’ शब्द का प्रयोग किया था।
आप आई.टी. के जानकार हैं और इतनी अच्छी कविता भी कर लेते हैं। यदि शुरुआत आपने इन विषयों से की होती तो इस तरह नाहक आहत होने की नौबत नहीं आती और ‘बैलों की लड़ाई में घास की तरह पिसना’ नहीं पड़ता। अब देखिए, आपने हमारे लिए ‘बैल’ शब्द का भी प्रयोग किया है। क्या हम भी आहत हो लें आपकी तरह!
@ अतुल (अरोरा) जी,
आपने बिल्कुल सही कहा। ऐसा ही कुछ हुआ है मेरे साथ। मेरे जैसे चिट्ठाकार ने, जिसने किसी भी विषय में पीएच.डी. नहीं कर रखी है (क्योंकि ‘राग-दरबारी’ पढ़कर पहले ही समझ में आ चुका था कि यह ‘घास खोदने’ जैसा कोई काम है
), इन पीएच.डी.धारी चिट्ठाकारों के कुटिल कुतर्कों का उत्तर देने के लिए जब टिप्पणी करने और बहस को विवाद में बदलते हुए देखने पर व्यक्तिगत आक्षेपों एवं प्रहारों से चिट्ठाकारों को बचने की सलाह देने की जुर्रत की तो ‘आ बैल मुझे मार’ वाली स्थिति ही पैदा हो गई।
चिट्ठाकारी के ‘भीष्म पितामहों’ को भी ‘दुर्योधनों’ के पक्ष में खड़े दिखाई देने में कई बार ग्लानि या हिचक महसूस नहीं होती। पता नहीं वे किस भीष्म-प्रतिज्ञा से बंधे होने के कारण ऐसा करने के लिए विवश रहते हैं! और जब कभी वे ऐसा नहीं करते तो आपद् धर्म का निर्वहन करने वाले ‘भीमों’ को शांति: शांति: का संदेश देने लग जाते हैं! पुराने चिट्ठाकारों में आप जैसे ‘विदुर’ कम ही हैं जो ‘दुर्योधन’ का साथ देने की बजाय दरबार छोड़ कर निकल जाना पसंद करते हैं।
जो मित्र (?) ऑनलाइन जगत के विवादों को ‘रीयल’ दुनिया के ‘क़ानूनी (या शायद गैर-क़ानूनी भी)’ हथकंडों से निपटाने की धमकी देने का अब भी दुस्साहस कर रहे हैं, उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं है कि यह सृजन शिल्पी जो सज्जनों के लिए जितना सृजनकारी है, दुष्टों के लिए उतना ही संहारकारी भी हो सकता है।
मेरे नाम से टिप्पणी, शायद कोई और अतुल हो। सृजन शिल्पीजी वैसे ये अतुल भी ठीक ही कह रहे हैं कि इन विशेषज्ञ चिट्ठकारों को आम चिट्ठाकार शायद ज़वाब न दे पाए क्योंकि ये लोग तो शब्दो के खिलाडी हैं। आप ही हैं जो प्रतिउत्तर दे सकते हैं। आपने इस पोस्ट में बता ही दिया है कि आप ”शठे शाठ्यम समाचरेत” जानते हैं और अमल भी कर सकते हैं। एक ध्येय वाक्य और है ‘हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं’। परंतु ये सभी, सब जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं। आपकी ऊर्जा व्यर्थ नहीं गई।
जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं उन्हें यह ज़रूर समझ लेना चाहिए-
”यदि आप भारतीय हैं, भारत में रहते हैं और भारत के संविधान को मानते हैं तो आप संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत दिए गए वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार के साथ जुड़ी शर्तों को कदापि नहीं भूल सकते। वे शर्तें कुछ इस प्रकार हैं – अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता, भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में लगाई गई पाबंदियों के अध्यधीन है।”
‘हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं’।
…ऑनलाइन जगत के विवादों को ‘रीयल’ दुनिया के ‘क़ानूनी (या शायद गैर-क़ानूनी भी)’ हथकंडों से निपटाने की धमकी देने का अब भी दुस्साहस कर रहे हैं,…
चलिये आपने यह तो माना कि “”रीयल”" दुनिया और “”आनलाइन”" जगत दोनो अलग अलग है।
धन्यवाद!
@ आलोचक जी,
‘रीयल’ तथा ‘वर्चुअल’ ऑनलाइन वर्ल्ड के बीच का फर्क केवल माध्यम का फर्क है। जहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात है, संविधान में इस स्वतंत्रता के साथ जोड़ी गई शर्तें दोनों जगत पर समान रूप से लागू होती हैं। ऐसा नहीं है कि मुखौटे के पीछे छिप जाने से उसका उल्लंघन करने पर उसके नतीजों से बच सकने की गुंजाइश मिल जाएगी। जब तक कोई सत्य और मर्यादा के दायरे में है तभी तक मुखौटे के पीछे का असली चेहरा भी सुरक्षित है। चिट्ठाकार ‘नेटीजन’ होने से पहले और उसके बाद भी देश का ’सिटीजन’ है और किसी भी स्थिति में, चाहे वह संविधान को जानता हो या न जानता हो, मानता हो या न मानता हो, वह संविधान के दायरे से बाहर नहीं जा सकता।