पिछले कुछ दिनों से हिन्दी चिट्ठाकारी में सांप्रदायिकता पर बहस के बहाने कुछ साथियों के बीच अवांछित और अप्रिय भाषा में तकरार हुई है, जिससे चिट्ठाकारी से जुड़े सभी लोगों को दु:ख हुआ है। हम मुद्दों पर बहस करने के बजाय व्यक्तियों पर प्रहार करने लग जाते हैं। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, लेकिन बार-बार के अनुभवों के बावजूद हमारे अंदर परिपक्वता क्यों नहीं आती! आशा है कि कल 11 मार्च को दिल्ली में चिट्ठाकारों की जो बैठक होने वाली है, उससे हमारे आपसी रिश्तों में मधुरता और घनिष्ठता का माहौल बहाल करने में मदद मिलेगी। अभी स्वामी विवेकानन्द का एक भाषण पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने हम भारतीयों के बीच एकत्व की भावना के घोर अभाव पर क्षोभ व्यक्त किया है। चिट्ठाकार साथियों को यह आज भी उतना ही प्रासंगिक महसूस होगा।
“भाइयों, हम सभी चीजों से निज़ात पा सकते हैं, लेकिन इस अभिशप्त ईर्ष्या से नहीं….। यह हमारा राष्ट्रीय पाप है, दूसरों की बुराई करना और दूसरों की महानता से जलना। हम इसका परित्याग करके साथ-साथ काम नहीं कर सकते।
ईर्ष्या और अहंकार के सभी विचारों को हमेशा के लिए निकाल फेंको। आप सभी से मैं यही अपेक्षा करता हूँ कि आत्मश्लाघा, गुटबाजी और ईर्ष्या की भावना को हमेशा के लिए आप त्याग दें।
यह ईर्ष्या…समवेत होकर कार्य नहीं कर सकने की मानसिकता…, दासता की स्थिति वाले राष्ट्रों का स्वभाव है। लेकिन हमें इस स्वभाव को बदलने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।
जब तक दुर्भावना, ईर्ष्या और अहंकार कायम है तब तक कुछ भी भला हो सकने की संभावना नहीं है। यह भीषण ईर्ष्या और संदेहशील स्वभाव हजारों वर्षों की गुलामी का स्वाभाविक परिणाम है।
भारत में पांच मिनट भी तीन आदमी एक साथ मिल-जुलकर कार्य नहीं कर सकते। हर कोई अधिकार हासिल करने के दाँव में जुटा रहता है और आखिरकार पूरे संगठन को संकट में डाल देता है। हमलोग कब अहंकार से मुक्त होना सीखेंगे?”
- स्वामी विवेकानन्द
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बहुत सुन्दर विचार। आशा है सब लोग इनसे सीख लेंगे।
“…भारत में पांच मिनट भी तीन आदमी एक साथ मिल-जुलकर कार्य नहीं कर सकते। …”
क्या सनातन सत्य है! दशकों पहले अनुभव की गई बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक और सत्य है! कुछ भी नहीं बदला है – कुछ भी नहीं. स्वामी विवेकानंद के दर्शन का लोहा इसीलिए तो माना जाता है
सृजन जी बिल्कुल सही समय पर आपके ये सुझाव आए.. उम्मीद है कि हमारे तमाम चिट्ठाकार इस पर मनन करेंगे
और पढ़ाने की जरूरत है स्वामी विवेकानन्दजी को । उनके इस उद्धरण को प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक आभार।
सत्य!
सवाल यह है कि क्या सृजन के आनंद से बड़ा विध्वंस का सुख है?
एक सरल उपाय है त्वरित प्रतिक्रिया से बचा जाये !
हां, शायद यही सही है कि त्वरित प्रतिक्रिया न करके ठन्डे मन से विचार करें और उसके बाद प्रतिक्रिया मुद्दॊ पर होगी न कि व्यक्ति विशेष पर.
बहुत अच्छी सीख. सृजन शिल्पी जी को धन्यवाद.
Bahut he prena pard sar Vivekanandji ke sekhbhare lectures se
aur Ashish ke salah to solah anna sach hai jeevan main bahut
kaam degi Sarjan shilpi ka dhanyawad