Posted in निजी डायरी, राजनीति on December 28th, 2007 3 Comments »
मेरी पिछली पोस्ट “पार्टनर, मेरी पॉलिटिक्स यह है” पर टिप्पणी करते हुए अपने ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने एक बुनियादी सवाल पूछ लिया है:
शायद पूछा जा सकता है – “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्यूं है?” मैं अच्छे भले लोगों को राजनैतिक मुद्दों पर कुकरहाव करते देखता हूं तो यह सवाल मन में आता है।
इसलिए इस बेहद [...]
बुद्धिजीवियों की उस मुर्दा और पाखंडी जमात में शामिल होने का अपना मन नहीं रहा है जो अपनी हसरतों और ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए ज़मीर को ताक पर रखकर चापलूसी और गुटबाजी के सारे दाँव-पेंच आजमाते हुए लाला और बाजार की नौकरी बजाने के बाद कोई अनुकूल मंच पाते ही अपनी सारी भड़ास [...]
तटस्थ मतदाताओं का अपराध
आप तो जानते ही हैं कि जो निर्णायक मौकों पर तटस्थ रहते हैं, समय उनके भी अपराध लिखता है। क्या आप भी उन चालीस फीसदी तटस्थ मतदाताओं में शामिल हैं जो चुनाव के दौरान अपना वोट डालने मतदान केन्द्रों पर नहीं जाते? यदि हाँ तो आप भी समय की डायरी में दर्ज [...]