Posted in चिट्ठाकारिता, निजी डायरी on November 30th, 2007 15 Comments »
चिट्ठाकारी के बहाने कई नए मित्र मिले हैं। उनके साथ प्रत्यक्ष संवाद और भेंट के अवसर भले ही कभी-कभार मिलते हों, लेकिन उनके चिट्ठों से उनके विचारों और अनुभवों के बारे में नियमित रूप से जानने को मिलता रहता है। हालांकि एक व्यक्ति के भीतर कई बार व्यक्तित्व की अनेक परतें भी होती हैं, फिर [...]
Posted in जन सरोकार, व्यंग्य, समसामयिक on November 24th, 2007 7 Comments »
हमारे लोकतंत्र के सबसे शक्तिशाली शाही ख़ानदान के शहजादों और शहजादियों के बीच एक ख़ास फ़र्क पर आपने भी गौर किया होगा। शहजादों को मोहब्बत होती है गोरी, विलायती मेमों से और शहजादियों को मोहब्बत होती है आम हिन्दुस्तानी मर्दों से। शहजादे विलायती गोरियों के इशारे पर नाचते हैं और शहजादियाँ हिन्दुस्तानी मर्दों को इशारे [...]
हम दिल्ली वाले अपने कई धार्मिक त्यौहार सड़कों पर मनाने में अपनी शान समझते हैं। वोट बैंक की राजनीति के कारण सरकार भी इसे संरक्षण देती है। दिल्ली यातायात पुलिस ऐसे अवसरों पर अपने अविवेक का परिचय देते हुए सार्वजनिक परिवहन को ठप्प या बाधित कर देती है। सिख धर्म के कुछ पर्वों के अवसर [...]