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	<title>Comments on: सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण</title>
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	<description>बेहतर दुनिया के लिए बेहतर इंसान चाहिए</description>
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		<title>By: लाक्षागृह भूमंडलीय बाजार में मनुष्य की नियति। विनाश और सर्वनाश का चौतरफा इंतजाम। कारपोरेट वाता</title>
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		<dc:creator>लाक्षागृह भूमंडलीय बाजार में मनुष्य की नियति। विनाश और सर्वनाश का चौतरफा इंतजाम। कारपोरेट वाता</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 May 2008 16:33:25 +0000</pubDate>
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		<description>[...] सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण [...]</p>
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		<title>By: Bipin</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-5045</link>
		<dc:creator>Bipin</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 04:48:43 +0000</pubDate>
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		<description>maine srijanshilpi ji ka lekh padha yah ek bahut hi pyara bahas ka mudda hain, per eske virodh mein sanjay ji ka tippani bahut hi bekar hain ki kya kok aur pepsi ko band kar dene se sabko pani mil jayegi. hum logon ko yah to sochana hi hoga ji humare yahan ke aam adami ki buniyadi jaruraton ke liye bhi socha jana chahiye aur jab tak yah soch nahin paida hoga tabtak humlog apane parivesh main badlao nahhin la payenge aur hum logon ka bhala nahin ho payega.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>maine srijanshilpi ji ka lekh padha yah ek bahut hi pyara bahas ka mudda hain, per eske virodh mein sanjay ji ka tippani bahut hi bekar hain ki kya kok aur pepsi ko band kar dene se sabko pani mil jayegi. hum logon ko yah to sochana hi hoga ji humare yahan ke aam adami ki buniyadi jaruraton ke liye bhi socha jana chahiye aur jab tak yah soch nahin paida hoga tabtak humlog apane parivesh main badlao nahhin la payenge aur hum logon ka bhala nahin ho payega.</p>
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		<title>By: फ़ुरसतिया &#187; मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-228</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया &#187; मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 19 Nov 2006 13:16:04 +0000</pubDate>
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		<description>[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, &#8216;कथादेश&#8217;, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ &#8216;मैं और मेरा समय&#8217;में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, &#8216;कथादेश&#8217;, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ &#8216;मैं और मेरा समय&#8217;में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]</p>
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	<item>
		<title>By: सरकारी सुस्ती और चहेतों का पूंजीवाद &#171; कीबोर्ड के सिपाही</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-223</link>
		<dc:creator>सरकारी सुस्ती और चहेतों का पूंजीवाद &#171; कीबोर्ड के सिपाही</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Nov 2006 10:06:36 +0000</pubDate>
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		<description>[...] इन दिनों भूमंडलीकरण पर बहस छिड़ी है. बहस की शुरूआत सृजनशिल्पी जी ने की जिसमें असहमति के स्वर छेड़ते हुए संजय जी ने टीप क्या मारी कुछ लोग नाराज़ हो गए. आप पूछेंगे कि सिपाही को कैसे पता चला? हुआ ये कि नारद ने जब बताया कि सृजनशिल्पी का नया लेख छपा है तो अपन उनके डेरे पर भागे और लेख पढ़ते-पढ़ते आखरी में संजय जी की टिप्पणी पढ़ी. अपना माथा ठनका कि ये क्या कहा संजय भैया ने? सृजन जी के लेख के अंतिम सिरे पर कुछ समाधान की बातें थी. उनका कहना था -  [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] इन दिनों भूमंडलीकरण पर बहस छिड़ी है. बहस की शुरूआत सृजनशिल्पी जी ने की जिसमें असहमति के स्वर छेड़ते हुए संजय जी ने टीप क्या मारी कुछ लोग नाराज़ हो गए. आप पूछेंगे कि सिपाही को कैसे पता चला? हुआ ये कि नारद ने जब बताया कि सृजनशिल्पी का नया लेख छपा है तो अपन उनके डेरे पर भागे और लेख पढ़ते-पढ़ते आखरी में संजय जी की टिप्पणी पढ़ी. अपना माथा ठनका कि ये क्या कहा संजय भैया ने? सृजन जी के लेख के अंतिम सिरे पर कुछ समाधान की बातें थी. उनका कहना था -  [...]</p>
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	<item>
		<title>By: भ्रमित है भ्रम &#8230;.. &#171; world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!!</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-219</link>
		<dc:creator>भ्रमित है भ्रम &#8230;.. &#171; world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!!</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Nov 2006 20:14:44 +0000</pubDate>
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		<description>[...] यहाँ इस मुद्दे की शुरुआत हुई सृजनशिल्पी जी के लेख &#8220;सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण&#8221; से जिस पर संजय भाई की टिप्पणी से तथाकथित हलचल हुई, कुछ लोगों के पंख हिले। ज़्यादा कुछ नहीं संजय भाई ने बस इतना ही कहा था:  मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा? [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] यहाँ इस मुद्दे की शुरुआत हुई सृजनशिल्पी जी के लेख &#8220;सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण&#8221; से जिस पर संजय भाई की टिप्पणी से तथाकथित हलचल हुई, कुछ लोगों के पंख हिले। ज़्यादा कुछ नहीं संजय भाई ने बस इतना ही कहा था:  मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा? [...]</p>
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	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-206</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Nov 2006 06:13:41 +0000</pubDate>
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		<description>संजय ,
       पेप्सी का आसान किंतु नुकसानदेह विकल्प जब नहीं होगा तो (पानी तो जब मिलेगा तब मिलेगा और कोक-पेप्सी में भी पानी तो भारत का ही है,अब अमेरिका से तो पानी के टैंकर आने से रहे)  आप लस्सी की तरफ़ उन्मुख होंगे और तब आप खस,केवड़ा और गुलाब के शरबत के बारे में भी सोचेंगे जो अब कहीं दिखाई नहीं देते या दिखाई देते भी हैं तो बहुत ढूंढने पर. 
बचपन में गर्मी के दिनों में घरों और शादी-बारातों-समारोहों  में अमूमन मिलने वाली ठंडाई अब कहां है ? इन सब प्रश्नों पर जब सोचेंगे तब आपको कोक-पेप्सी के दुष्प्रभाव का सही अंदाज़ा हो पाएगा . रही बात पांच सितारा स्कूलों की तो इनके बिना भी सबको शिक्षा मिलेगी और एक जैसी मिलेगी. तब राजा और प्रजा बनाने वाले दो तरह के अलग-अलग स्कूल भी नहीं होंगे . देश और समाज के बारे में बात करते समय थोड़ा संवेदनशील होना होगा . अन्यथा हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ही फायदा पहुंचाएंगे .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>संजय ,<br />
       पेप्सी का आसान किंतु नुकसानदेह विकल्प जब नहीं होगा तो (पानी तो जब मिलेगा तब मिलेगा और कोक-पेप्सी में भी पानी तो भारत का ही है,अब अमेरिका से तो पानी के टैंकर आने से रहे)  आप लस्सी की तरफ़ उन्मुख होंगे और तब आप खस,केवड़ा और गुलाब के शरबत के बारे में भी सोचेंगे जो अब कहीं दिखाई नहीं देते या दिखाई देते भी हैं तो बहुत ढूंढने पर.<br />
बचपन में गर्मी के दिनों में घरों और शादी-बारातों-समारोहों  में अमूमन मिलने वाली ठंडाई अब कहां है ? इन सब प्रश्नों पर जब सोचेंगे तब आपको कोक-पेप्सी के दुष्प्रभाव का सही अंदाज़ा हो पाएगा . रही बात पांच सितारा स्कूलों की तो इनके बिना भी सबको शिक्षा मिलेगी और एक जैसी मिलेगी. तब राजा और प्रजा बनाने वाले दो तरह के अलग-अलग स्कूल भी नहीं होंगे . देश और समाज के बारे में बात करते समय थोड़ा संवेदनशील होना होगा . अन्यथा हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ही फायदा पहुंचाएंगे .</p>
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		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-205</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Nov 2006 04:28:00 +0000</pubDate>
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		<description>मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा?</p>
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		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-204</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Nov 2006 02:06:30 +0000</pubDate>
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		<description>सुंदरता से किया गया विश्लेषण बहुत प्रभावी है, बधाई. अभी बहुतेरे प्रयासों की आवश्यकता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सुंदरता से किया गया विश्लेषण बहुत प्रभावी है, बधाई. अभी बहुतेरे प्रयासों की आवश्यकता है.</p>
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	<item>
		<title>By: अनुराग</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-203</link>
		<dc:creator>अनुराग</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Nov 2006 20:05:45 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=70#comment-203</guid>
		<description>काफी सही विश्लेषण है आपका। सर्वप्रथम आवश्यकता है, अपने ऊपर विश्वास की। चीन और जापान जिसके अच्छे उदाहरण हैं। Globalization is a necessary evil. इससे भागा नहीं जा सकता. किंतु घरेलू मोर्चे पर भी हमें मेहनत करनी होगी। कृषि और छोटे उद्योगों को आगे बढ़ाना ही पड़ेगा यदि हम आत्मनिर्भर समाज चाहते हैं तो।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काफी सही विश्लेषण है आपका। सर्वप्रथम आवश्यकता है, अपने ऊपर विश्वास की। चीन और जापान जिसके अच्छे उदाहरण हैं। Globalization is a necessary evil. इससे भागा नहीं जा सकता. किंतु घरेलू मोर्चे पर भी हमें मेहनत करनी होगी। कृषि और छोटे उद्योगों को आगे बढ़ाना ही पड़ेगा यदि हम आत्मनिर्भर समाज चाहते हैं तो।</p>
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