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	<title>Comments on: मिलन, मुखौटे और आचार-संहिता</title>
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	<description>बेहतर दुनिया के लिए बेहतर इंसान चाहिए</description>
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		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-724</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Mar 2007 09:52:54 +0000</pubDate>
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		<description>@ आलोचक जी,
&#039;रीयल&#039; तथा &#039;वर्चुअल&#039; ऑनलाइन वर्ल्ड के बीच का फर्क केवल माध्यम का फर्क है। जहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात है, संविधान में इस स्वतंत्रता के साथ जोड़ी गई शर्तें दोनों जगत पर समान रूप से लागू होती हैं। ऐसा नहीं है कि मुखौटे के पीछे छिप जाने से उसका उल्लंघन करने पर उसके नतीजों से बच सकने की गुंजाइश मिल जाएगी। जब तक कोई सत्य और मर्यादा के दायरे में है तभी तक मुखौटे के पीछे का असली चेहरा भी सुरक्षित है। चिट्ठाकार &#039;नेटीजन&#039; होने से पहले और उसके बाद भी देश का &#039;सिटीजन&#039; है और किसी भी स्थिति में, चाहे वह संविधान को जानता हो या न जानता हो, मानता हो या न मानता हो, वह संविधान के दायरे से बाहर नहीं जा सकता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ आलोचक जी,<br />
&#8216;रीयल&#8217; तथा &#8216;वर्चुअल&#8217; ऑनलाइन वर्ल्ड के बीच का फर्क केवल माध्यम का फर्क है। जहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात है, संविधान में इस स्वतंत्रता के साथ जोड़ी गई शर्तें दोनों जगत पर समान रूप से लागू होती हैं। ऐसा नहीं है कि मुखौटे के पीछे छिप जाने से उसका उल्लंघन करने पर उसके नतीजों से बच सकने की गुंजाइश मिल जाएगी। जब तक कोई सत्य और मर्यादा के दायरे में है तभी तक मुखौटे के पीछे का असली चेहरा भी सुरक्षित है। चिट्ठाकार &#8216;नेटीजन&#8217; होने से पहले और उसके बाद भी देश का &#8217;सिटीजन&#8217; है और किसी भी स्थिति में, चाहे वह संविधान को जानता हो या न जानता हो, मानता हो या न मानता हो, वह संविधान के दायरे से बाहर नहीं जा सकता।</p>
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	<item>
		<title>By: aalochak</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-711</link>
		<dc:creator>aalochak</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 23 Mar 2007 10:38:07 +0000</pubDate>
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		<description>‘हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं’। 
 ...ऑनलाइन जगत के विवादों को ‘रीयल’ दुनिया के ‘क़ानूनी (या शायद गैर-क़ानूनी भी)’ हथकंडों से निपटाने की धमकी देने का अब भी दुस्साहस कर रहे हैं,...
 चलिये आपने यह तो माना कि &quot;&quot;रीयल&quot;&quot; दुनिया और &quot;&quot;आनलाइन&quot;&quot; जगत दोनो अलग अलग है। 
 धन्यवाद!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>‘हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं’।<br />
 &#8230;ऑनलाइन जगत के विवादों को ‘रीयल’ दुनिया के ‘क़ानूनी (या शायद गैर-क़ानूनी भी)’ हथकंडों से निपटाने की धमकी देने का अब भी दुस्साहस कर रहे हैं,&#8230;<br />
 चलिये आपने यह तो माना कि &#8220;&#8221;रीयल&#8221;" दुनिया और &#8220;&#8221;आनलाइन&#8221;" जगत दोनो अलग अलग है।<br />
 धन्यवाद!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-704</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 23 Mar 2007 06:57:30 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-704</guid>
		<description>मेरे नाम से टिप्पणी, शायद कोई और अतुल हो। सृजन शिल्पीजी वैसे ये अतुल भी ठीक ही कह रहे हैं कि इन विशेषज्ञ चिट्ठकारों को आम चिट्ठाकार शायद ज़वाब न दे पाए क्योंकि ये लोग तो शब्दो के खिलाडी हैं। आप ही हैं जो प्रतिउत्तर दे सकते हैं। आपने इस पोस्ट में बता ही दिया है कि आप &#039;&#039;शठे शाठ्यम समाचरेत&#039;&#039; जानते हैं और अमल भी कर सकते हैं। एक ध्येय वाक्य और है &#039;हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं&#039;। परंतु ये सभी, सब जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं। आपकी ऊर्जा व्यर्थ नहीं गई।
जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं उन्हें यह ज़रूर समझ लेना चाहिए-
&#039;&#039;यदि आप भारतीय हैं, भारत में रहते हैं और भारत के संविधान को मानते हैं तो आप संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत दिए गए वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार के साथ जुड़ी शर्तों को कदापि नहीं भूल सकते। वे शर्तें कुछ इस प्रकार हैं - अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता, भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में लगाई गई पाबंदियों के अध्यधीन है।&#039;&#039;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे नाम से टिप्पणी, शायद कोई और अतुल हो। सृजन शिल्पीजी वैसे ये अतुल भी ठीक ही कह रहे हैं कि इन विशेषज्ञ चिट्ठकारों को आम चिट्ठाकार शायद ज़वाब न दे पाए क्योंकि ये लोग तो शब्दो के खिलाडी हैं। आप ही हैं जो प्रतिउत्तर दे सकते हैं। आपने इस पोस्ट में बता ही दिया है कि आप &#8221;शठे शाठ्यम समाचरेत&#8221; जानते हैं और अमल भी कर सकते हैं। एक ध्येय वाक्य और है &#8216;हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं&#8217;। परंतु ये सभी, सब जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं। आपकी ऊर्जा व्यर्थ नहीं गई।<br />
जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं उन्हें यह ज़रूर समझ लेना चाहिए-<br />
&#8221;यदि आप भारतीय हैं, भारत में रहते हैं और भारत के संविधान को मानते हैं तो आप संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत दिए गए वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार के साथ जुड़ी शर्तों को कदापि नहीं भूल सकते। वे शर्तें कुछ इस प्रकार हैं &#8211; अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता, भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में लगाई गई पाबंदियों के अध्यधीन है।&#8221;</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-699</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Mar 2007 09:06:42 +0000</pubDate>
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		<description>जो मित्र (?) ऑनलाइन जगत के विवादों को &#039;रीयल&#039; दुनिया के &#039;क़ानूनी (या शायद गैर-क़ानूनी भी)&#039; हथकंडों से निपटाने की धमकी देने का अब भी दुस्साहस कर रहे हैं, उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं है कि यह &lt;em&gt;सृजन शिल्पी&lt;/em&gt; जो सज्जनों के लिए जितना सृजनकारी है, दुष्टों के लिए उतना ही संहारकारी भी हो सकता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जो मित्र (?) ऑनलाइन जगत के विवादों को &#8216;रीयल&#8217; दुनिया के &#8216;क़ानूनी (या शायद गैर-क़ानूनी भी)&#8217; हथकंडों से निपटाने की धमकी देने का अब भी दुस्साहस कर रहे हैं, उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं है कि यह <em>सृजन शिल्पी</em> जो सज्जनों के लिए जितना सृजनकारी है, दुष्टों के लिए उतना ही संहारकारी भी हो सकता है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-698</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Mar 2007 08:56:56 +0000</pubDate>
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		<description>@ अतुल (अरोरा) जी,

आपने बिल्कुल सही कहा। ऐसा ही कुछ हुआ है मेरे साथ। मेरे जैसे चिट्ठाकार ने, जिसने किसी भी विषय में पीएच.डी. नहीं कर रखी है (क्योंकि &#039;राग-दरबारी&#039; पढ़कर पहले ही समझ में आ चुका था कि यह &#039;घास खोदने&#039; जैसा कोई काम है :)), इन पीएच.डी.धारी चिट्ठाकारों के कुटिल कुतर्कों का उत्तर देने के लिए जब टिप्पणी करने और बहस को विवाद में बदलते हुए देखने पर व्यक्तिगत आक्षेपों एवं प्रहारों से चिट्ठाकारों को बचने की सलाह देने की जुर्रत की तो &#039;आ बैल मुझे मार&#039; वाली स्थिति ही पैदा हो गई।

चिट्ठाकारी के &#039;भीष्म पितामहों&#039; को भी &#039;दुर्योधनों&#039; के पक्ष में खड़े दिखाई देने में कई बार ग्लानि या हिचक महसूस नहीं होती। पता नहीं वे किस भीष्म-प्रतिज्ञा से बंधे होने के कारण ऐसा करने के लिए विवश रहते हैं! और जब कभी वे ऐसा नहीं करते तो आपद् धर्म का निर्वहन करने वाले &#039;भीमों&#039; को शांति: शांति: का संदेश देने लग जाते हैं! पुराने चिट्ठाकारों में आप जैसे &#039;विदुर&#039; कम ही हैं जो &#039;दुर्योधन&#039; का साथ देने की बजाय दरबार छोड़ कर निकल जाना पसंद करते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ अतुल (अरोरा) जी,</p>
<p>आपने बिल्कुल सही कहा। ऐसा ही कुछ हुआ है मेरे साथ। मेरे जैसे चिट्ठाकार ने, जिसने किसी भी विषय में पीएच.डी. नहीं कर रखी है (क्योंकि &#8216;राग-दरबारी&#8217; पढ़कर पहले ही समझ में आ चुका था कि यह &#8216;घास खोदने&#8217; जैसा कोई काम है <img src='http://srijanshilpi.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> ), इन पीएच.डी.धारी चिट्ठाकारों के कुटिल कुतर्कों का उत्तर देने के लिए जब टिप्पणी करने और बहस को विवाद में बदलते हुए देखने पर व्यक्तिगत आक्षेपों एवं प्रहारों से चिट्ठाकारों को बचने की सलाह देने की जुर्रत की तो &#8216;आ बैल मुझे मार&#8217; वाली स्थिति ही पैदा हो गई।</p>
<p>चिट्ठाकारी के &#8216;भीष्म पितामहों&#8217; को भी &#8216;दुर्योधनों&#8217; के पक्ष में खड़े दिखाई देने में कई बार ग्लानि या हिचक महसूस नहीं होती। पता नहीं वे किस भीष्म-प्रतिज्ञा से बंधे होने के कारण ऐसा करने के लिए विवश रहते हैं! और जब कभी वे ऐसा नहीं करते तो आपद् धर्म का निर्वहन करने वाले &#8216;भीमों&#8217; को शांति: शांति: का संदेश देने लग जाते हैं! पुराने चिट्ठाकारों में आप जैसे &#8216;विदुर&#8217; कम ही हैं जो &#8216;दुर्योधन&#8217; का साथ देने की बजाय दरबार छोड़ कर निकल जाना पसंद करते हैं।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-697</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Mar 2007 06:37:08 +0000</pubDate>
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		<description>@ काकेश जी (धूमकेतु)! :)

मेरी टिप्पणी से आपकी संवेदना आहत हुई, इसके लिए मुझे खेद है। (मैंने आपकी कविता भी पढ़ ली है और वहां भी यह टिप्पणी की है) लेकिन आप खुद ही सोच कर देखें कि आपने चिट्ठा लेखन की शुरुआत “शुरुआती झटके” श्रेणी के अंतर्गत पोस्ट लिखकर की और विषय भी विवादास्पद चुना और लहज़ा भी कुछ ऐसा, जिसमें नवागत-सुलभ विनम्रता के कोई संकेत नहीं थे। जिस विषय की पृष्ठभूमि से आप भलीभांति अवगत न हों, उसपर भिड़ने के लिए आप ताल ठोंककर मैदान में उतर आएं तो फिर आपको कुछ सुनने के लिए तैयार भी रहना चाहिए। आपकी आपत्ति यही थी न कि चिट्ठाकारों के लिए ऐसी कोई आचार-संहिता नहीं होनी चाहिए जिसमें एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने पर कोई प्रतिबंध लागू हो। यदि आप व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने को सही ठहराए जाने का पक्ष लेते हैं तो फिर आपके आहत होने का तुक समझ में नहीं आता।

कोई नया चिट्ठाकार यदि इस तरह से शुरुआत करे तो कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि वह इरादतन ऐसा कर रहा है। चाहे वह अपनी तरफ सबका ध्यान आकर्षित करने के लिए कर रहा हो या फिर किसी से प्रेरित होकर ऐसा कर रहा हो। ‘धूमकेतु’ शब्द का प्रयोग मैंने किसी व्यंग्यात्मक अर्थ में नहीं किया था, वह सिर्फ लक्षणात्मक संबोधन था। धूमकेतु के लक्षण भी कुछ ऐसे ही होते हैं। यदि आप ऐसे नहीं हैं तो फिर अन्य आकाशीय पिंडों की तरह नियमित कक्षा में ही परिभ्रमण करें, बेहतर होगा।

लेकिन यदि आपको विवादों में उलझना पसंद है और चिट्ठा जगत में एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने को भी सही मानते हैं, तो फिर इस तरह की छोटी-छोटी बातों पर आहत मत हों। आप तो घोषणा कर ही चुके हैं कि आपको चिट्ठा जगत की &#039;राजनीति&#039; समझनी है और यहां के &#039;मगरमच्छों&#039; से निपटना है! यह भी रेखांकित कर रहा हूं कि कुछ पुराने चिट्ठाकारों के लिए (जिसमें आप शायद मुझे भी शामिल करके चल रहे हैं) ‘मगरमच्छ’ शब्द का प्रयोग करने की पहल आपने ही की थी। उसके बाद ही मैंने आपके लिए ‘धूमकेतु’ शब्द का प्रयोग किया था।

आप आई.टी. के जानकार हैं और इतनी अच्छी कविता भी कर लेते हैं। यदि शुरुआत आपने इन विषयों से की होती तो इस तरह नाहक आहत होने की नौबत नहीं आती और &#039;बैलों की लड़ाई में घास की तरह पिसना&#039; नहीं पड़ता। अब देखिए, आपने हमारे लिए &#039;बैल&#039; शब्द का भी प्रयोग किया है। क्या हम भी आहत हो लें आपकी तरह!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ काकेश जी (धूमकेतु)! <img src='http://srijanshilpi.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>मेरी टिप्पणी से आपकी संवेदना आहत हुई, इसके लिए मुझे खेद है। (मैंने आपकी कविता भी पढ़ ली है और वहां भी यह टिप्पणी की है) लेकिन आप खुद ही सोच कर देखें कि आपने चिट्ठा लेखन की शुरुआत “शुरुआती झटके” श्रेणी के अंतर्गत पोस्ट लिखकर की और विषय भी विवादास्पद चुना और लहज़ा भी कुछ ऐसा, जिसमें नवागत-सुलभ विनम्रता के कोई संकेत नहीं थे। जिस विषय की पृष्ठभूमि से आप भलीभांति अवगत न हों, उसपर भिड़ने के लिए आप ताल ठोंककर मैदान में उतर आएं तो फिर आपको कुछ सुनने के लिए तैयार भी रहना चाहिए। आपकी आपत्ति यही थी न कि चिट्ठाकारों के लिए ऐसी कोई आचार-संहिता नहीं होनी चाहिए जिसमें एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने पर कोई प्रतिबंध लागू हो। यदि आप व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने को सही ठहराए जाने का पक्ष लेते हैं तो फिर आपके आहत होने का तुक समझ में नहीं आता।</p>
<p>कोई नया चिट्ठाकार यदि इस तरह से शुरुआत करे तो कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि वह इरादतन ऐसा कर रहा है। चाहे वह अपनी तरफ सबका ध्यान आकर्षित करने के लिए कर रहा हो या फिर किसी से प्रेरित होकर ऐसा कर रहा हो। ‘धूमकेतु’ शब्द का प्रयोग मैंने किसी व्यंग्यात्मक अर्थ में नहीं किया था, वह सिर्फ लक्षणात्मक संबोधन था। धूमकेतु के लक्षण भी कुछ ऐसे ही होते हैं। यदि आप ऐसे नहीं हैं तो फिर अन्य आकाशीय पिंडों की तरह नियमित कक्षा में ही परिभ्रमण करें, बेहतर होगा।</p>
<p>लेकिन यदि आपको विवादों में उलझना पसंद है और चिट्ठा जगत में एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार किए जाने को भी सही मानते हैं, तो फिर इस तरह की छोटी-छोटी बातों पर आहत मत हों। आप तो घोषणा कर ही चुके हैं कि आपको चिट्ठा जगत की &#8216;राजनीति&#8217; समझनी है और यहां के &#8216;मगरमच्छों&#8217; से निपटना है! यह भी रेखांकित कर रहा हूं कि कुछ पुराने चिट्ठाकारों के लिए (जिसमें आप शायद मुझे भी शामिल करके चल रहे हैं) ‘मगरमच्छ’ शब्द का प्रयोग करने की पहल आपने ही की थी। उसके बाद ही मैंने आपके लिए ‘धूमकेतु’ शब्द का प्रयोग किया था।</p>
<p>आप आई.टी. के जानकार हैं और इतनी अच्छी कविता भी कर लेते हैं। यदि शुरुआत आपने इन विषयों से की होती तो इस तरह नाहक आहत होने की नौबत नहीं आती और &#8216;बैलों की लड़ाई में घास की तरह पिसना&#8217; नहीं पड़ता। अब देखिए, आपने हमारे लिए &#8216;बैल&#8217; शब्द का भी प्रयोग किया है। क्या हम भी आहत हो लें आपकी तरह!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अतुल</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-696</link>
		<dc:creator>अतुल</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Mar 2007 16:08:19 +0000</pubDate>
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		<description>मेरी समझ में एक ही उपाय आता है, जो सभी अबुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों को अपना लेना चाहिये, अपने चिठ्ठे के विषयों को कविता, चुटकुलेबाजी, सिनेमा और तकनीकी विषयों पर सीमित कर लें और साथ ही इनके अतिरिक्त किसी भी गंभीर विषयक चिट्ठे पर टिप्पणी न करे, क्योंकि समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र या अर्थशास्त्र (और हिन्दी) जैसे विषयों में पीएच.डी. किये बिना बुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों के चिट्ठे पर टिपियाना आ बैल मुझे मार की कहावत को चरितार्थ करेगा। बुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों के तर्कों-कुतर्को का हमारे पास या तो सटीक जवाब होगा नहीं, अगर देने की कोशिश की तो चिट्ठाकारी के भरतमुनि, भीष्म पितामह , भामह सभी हड़काने आयेंगे कि शांति शांति !

लगता है कि कुतर्क , वैमनस्यकारी भाषणबाजी और चारित्रिक दोहरेपन का विरोध अब संज्ञेय अपराध हो गया है!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी समझ में एक ही उपाय आता है, जो सभी अबुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों को अपना लेना चाहिये, अपने चिठ्ठे के विषयों को कविता, चुटकुलेबाजी, सिनेमा और तकनीकी विषयों पर सीमित कर लें और साथ ही इनके अतिरिक्त किसी भी गंभीर विषयक चिट्ठे पर टिप्पणी न करे, क्योंकि समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र या अर्थशास्त्र (और हिन्दी) जैसे विषयों में पीएच.डी. किये बिना बुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों के चिट्ठे पर टिपियाना आ बैल मुझे मार की कहावत को चरितार्थ करेगा। बुद्धिजीवी चिठ्ठाकारों के तर्कों-कुतर्को का हमारे पास या तो सटीक जवाब होगा नहीं, अगर देने की कोशिश की तो चिट्ठाकारी के भरतमुनि, भीष्म पितामह , भामह सभी हड़काने आयेंगे कि शांति शांति !</p>
<p>लगता है कि कुतर्क , वैमनस्यकारी भाषणबाजी और चारित्रिक दोहरेपन का विरोध अब संज्ञेय अपराध हो गया है!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सागर चन्द नाहर</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-695</link>
		<dc:creator>सागर चन्द नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Mar 2007 12:15:30 +0000</pubDate>
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		<description>अनूप शुक्ला जी, जीतू भाई और संजय भाई की टिप्पणी को कॉपी-पेस्ट कर लेवें, मेरे विचार आपके सामने होंगे। :)

यानी मैं भी इन सबसे सहमत हूँ और आपसे भी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनूप शुक्ला जी, जीतू भाई और संजय भाई की टिप्पणी को कॉपी-पेस्ट कर लेवें, मेरे विचार आपके सामने होंगे। <img src='http://srijanshilpi.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>यानी मैं भी इन सबसे सहमत हूँ और आपसे भी।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: आशीष श्रीवास्तव</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-694</link>
		<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Mar 2007 09:43:11 +0000</pubDate>
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		<description>मै भी अनूप जी का आंख मूंद कर समर्थन कर रहा हूं !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मै भी अनूप जी का आंख मूंद कर समर्थन कर रहा हूं !</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-691</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Mar 2007 07:12:27 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=106#comment-691</guid>
		<description>सृजन जी,
आप रचनात्मक व्यक्ति हैं, आप अपना ध्यान लिखने मे लगाएं, कहाँ इन सब चक्करों मे पड़ गए? इत्ता बड़ा लेख लिख डाला, आधा पल्ले पड़ा आधा नहीं। ख़ैर, जानने की जरुरत भी नहीं। मेरा तो यही मानना है कि द्विपक्षीय मुद्दे ब्लॉग पर लिखने की बजाए, आपसी बातचीत से सुलझा लिए जाने चाहिए।

वैसे, आपके इस लेख के बाद आपके न चाहते हुए भी मुखौटा परिवार अब अज्ञात नहीं रह गया है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सृजन जी,<br />
आप रचनात्मक व्यक्ति हैं, आप अपना ध्यान लिखने मे लगाएं, कहाँ इन सब चक्करों मे पड़ गए? इत्ता बड़ा लेख लिख डाला, आधा पल्ले पड़ा आधा नहीं। ख़ैर, जानने की जरुरत भी नहीं। मेरा तो यही मानना है कि द्विपक्षीय मुद्दे ब्लॉग पर लिखने की बजाए, आपसी बातचीत से सुलझा लिए जाने चाहिए।</p>
<p>वैसे, आपके इस लेख के बाद आपके न चाहते हुए भी मुखौटा परिवार अब अज्ञात नहीं रह गया है।</p>
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