<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Srijan Shilpi</title>
	<atom:link href="http://srijanshilpi.com/?feed=rss2" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://srijanshilpi.com</link>
	<description>बेहतर दुनिया के लिए बेहतर इंसान चाहिए</description>
	<lastBuildDate>Sat, 08 May 2010 03:17:54 +0000</lastBuildDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.8.2</generator>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
			<item>
		<title>भरी दोपहर में आधे घंटे की सैर</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=179</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=179#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 08 May 2010 02:38:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[निजी डायरी]]></category>
		<category><![CDATA[स्वास्थ्य]]></category>
		<category><![CDATA[fitness]]></category>
		<category><![CDATA[health]]></category>
		<category><![CDATA[personal diary]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=179</guid>
		<description><![CDATA[टहलने जैसी बुनियादी आदत का छूट जाना कभी-कभी बिल्कुल अस्वाभाविक-सा लगता है। किंतु जब अपनी सेहत पर इसके दूरगामी असर को महसूस करता हूं तो बेहद अफसोस होता है। अपने फिटनेस को कायम नहीं रख पाना और ब्लड प्रेशर, हाइपो थायराइड, हाइपरटेंशन, मोटापा जैसे लाइफ स्टाइल से जुड़े रोगों की चपेट में आ जाना किसी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>टहलने जैसी बुनियादी आदत का छूट जाना कभी-कभी बिल्कुल अस्वाभाविक-सा लगता है। किंतु जब अपनी सेहत पर इसके दूरगामी असर को महसूस करता हूं तो बेहद अफसोस होता है। अपने फिटनेस को कायम नहीं रख पाना और ब्लड प्रेशर, हाइपो थायराइड, हाइपरटेंशन, मोटापा जैसे लाइफ स्टाइल से जुड़े रोगों की चपेट में आ जाना किसी गुनाह से कम नहीं है।</p>
<p>पिछले कुछ वर्षों से सुबह-शाम टहलने का सिलसिला लगभग छूट-सा गया है। यह समय अब ज्यादातर बेटी की देखभाल में गुजरता है, जो लगभग दो वर्ष की होने जा रही है। उसके घर में आने से पहले ही इंटरनेट और खासकर ब्लॉगिंग की लत ने टहलने की आदत में सेंध लगा दी थी। </p>
<p>बेटी के पदार्पण के बाद ब्लॉगिंग की लत एक तरह से छूट-सी गई, मगर तब तक शरीर के आकार और वजन में असंतुलन स्पष्ट नज़र आने लगा था। हालांकि रात को सोने से पहले कुछ देर टहलने का सिलसिला शुरू करने की कोशिश की, पर उसे भी रोज-रोज निभा पाना मुमकिन नहीं हो सका। क्योंकि अपनी दिनचर्या श्रीमतीजी की शिफ्ट ड्यूटी के हिसाब से हर हफ्ते बदल जाती है।</p>
<p>किसी मित्र-शुभचिंतक से इन दिनों जब अरसे बाद मुलाकात होती है तो बढ़ते तोंद को लेकर नसीहत सुनने के लिए तैयार रहता हूं। अभी हाल में एक पुराने मित्र बरसों बाद घर पधारे। पुलिस में इंस्पेक्टर हैं और सेहत को लेकर आदतन ही नहीं, प्रोफेशनली भी बेहद सचेत हैं। देर तक वह मोटापे की दस्तक से आगाह करते रहे, और तरह-तरह के टिप्स बताते रहे। </p>
<p>वैसे तो पिछले कुछ वर्षों से बाबा रामदेव की चहुँ ओर धूम है और उनके योग शिविरों में जाकर या घर बैठे टेलीविजन के सामने बैठकर कपालभाति और अनुलोम-विलोम का अभ्यास करके अपनी सेहत में सुधार लाने वाले उद्यमियों की तादाद करोड़ों में बताई जाती है। पर अपन अभागे हैं, उन करोड़ों लोगों में अब तक शामिल नहीं हो पाए हैं।</p>
<p>फिलहाल तो हम टहलने की अपनी आदत को फिर से नियमित बनाने की चेष्टा में लगे हैं। सुबह-शाम न सही, दोपहर में, लंच के बाद ऑफिस के दो-एक सहकर्मियों के साथ लगभग नियमित रूप से आधे घंटे की सैर पर निकलते हैं। सर्दी हो या गर्मी हो या बरसात हो– इस सिलसिले को पिछले दो वर्ष से कायम रखने की पूरी कोशिश की जा रही है।
<div style="border-top: 7px solid #5c8a64; border-bottom: 7px solid #5c8a64; margin: 12px; font-weight: bold; font-size: 13pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 115%; padding-top: 7px; text-align: center">&#8220;सर्दी-गर्मी और सुख-दु:ख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति, विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिये हे भारत ! उनको तू सहन कर।।&#8221;</div>
<p>अपने-आप में यह रोमांचकारी अनुभव है। खासकर, इन दिनों जब तापमान आम तौर पर चालीस डिग्री से ऊपर ही होता है, दफ्तर के वातानुकूलित माहौल से निकलकर थोड़ी देर के लिए तेज धूप की तपिश को तेज कदमों से चलते हुए भीतर तक महसूस करना और वापस एसी के शीतल माहौल में लौटकर राहत की सांस महसूस करना एक अलग ही मजा देता है। केन्द्रीय दिल्ली के हरित क्षेत्र में सड़क के दोनों किनारों पर घने वृक्षों की छाया में दुपहरिया में टहलने का आनंद ही कुछ और है।</p>
<p>विज्ञान और टेक्नोलॉजी के आज के दौर में जैसे-जैसे हमलोगों की साधन-संपन्नता बढ़ रही है, हम बदलते मौसम के अंतरंग अनुभव से कटते जा रहे हैं। तो ऐसे में गीता के श्रीकृष्ण की यह सलाह कहीं अधिक प्रासंगिक मालूम पड़ती है :</p>
<p><strong>मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।<br />
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।</strong></p>
<p>(हे कुन्ती पुत्र ! सर्दी-गर्मी और सुख-दु:ख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति, विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिये हे भारत ! उनको तू सहन कर।।) </p>
<p>अब लगता है कि नियति भी इस मामले में मेरा साथ देने वाली है। कई वर्षों बाद अब फिर, दफ्तर से एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर आवास की सुविधा मिल गई है। घर के सामने ही राष्ट्रीय स्तर का एक योग प्रशिक्षण संस्थान भी है। तो, कम-से-कम घर से दफ्तर आने-जाने के लिए गाड़ी का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के पैदल चलने की आदत फिर से पड़ जाएगी। पड़ोस के योग संस्थान से दो-एक महीने का प्रशिक्षण भी ले लेने की सोच रहा हूं। </p>
<p>आपलोगों की शुभकामनाएं रहीं तो लगता है कि खोई सेहत दोबारा से लौट सकेगी। </p>
<p><strong>पिछली कुछ पोस्ट :</strong><br />
<a href="http://srijanshilpi.com/?p=64">सेहत के लिए सिर्फ सोलह मिनट</a><br />
<a href="http://srijanshilpi.com/?p=55">संसद में मच्छर पर चर्चा और देश में डेंगू की दहशत</a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=179</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>कमीने और ईमानदार</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=171</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=171#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 28 Apr 2010 15:34:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[निजी डायरी]]></category>
		<category><![CDATA[प्रेरक विचार]]></category>
		<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=171</guid>
		<description><![CDATA[http://srijanshilpi.com/?p=27]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भले और बुरे इंसान में फ़र्क़ करने की कसौटी यह बताई है कि जो दूसरों को सुखी देखकर खुश हो, वह भला आदमी है और जो दूसरों को दु:खी देखकर खुश हो, वह बुरा आदमी है।</p>
<p>इसी तर्ज़ पर, कमीने और ईमानदार व्यक्ति के बीच फ़र्क़ करने की मोटे तौर पर एक कसौटी यह हो सकती है कि जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को, यथासंभव, दु:खी न करने की चेष्टा करे वह ईमानदार है और जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को दु:खी करने की यथासंभव चेष्टा करे, वह कमीना है।</p>
<p>लेकिन, एक दूसरा बड़ा फ़र्क़ भी है। ईमानदार व्यक्ति जब अपने न्यायपूर्ण हितों के लिए सत्य के सहारे आगे बढ़ता है तो वह किसी को दु:खी नहीं करने की भरसक चेष्टा करने के बावजूद लड़ाई में खुलकर सामने आ जाने की वजह से कई लोगों की नाराजगी मोल ले लेता है और बहुत-सी अनचाही परेशानियों से घिर जाता है। जबकि कमीना व्यक्ति अपने स्वार्थ की पूर्ति या अहं की तुष्टि की राह में बाधक बन सकने वाले व्यक्ति को रास्ते से हटाने के लिए हर तरह के कुचक्र रचते रहने के बावजूद परदे के पीछे छिपे रहने की कोशिश करता है।</p>
<p>इसलिए, किसी कमीने से निपटने के लिए पहले उसके बारे में सतर्क हो जाना जरूरी है। उसके कुचक्रों का पर्दाफाश होते ही कमीने को पस्त होने में देर नहीं लगती।
<div style="border-top: 7px solid #5c8a64; border-bottom: 7px solid #5c8a64; margin: 12px; font-weight: bold; font-size: 13pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 115%; padding-top: 7px; text-align: center">&#8220;यदि आप ईमानदार हैं, पर अपने आसपास छिपे कमीनों के प्रति सतर्क नहीं हैं तो सच की लड़ाई में जीतने की बात तो दूर जाने दीजिए, आप सामान्य जिंदगी भी खुशहाली से नहीं जी सकते।&#8221;</div>
<p>यदि आप ईमानदार हैं, पर अपने आसपास छिपे कमीनों के प्रति सतर्क नहीं हैं तो सच की लड़ाई में जीतने की बात तो दूर जाने दीजिए, आप सामान्य जिंदगी भी खुशहाली से नहीं जी सकते। </p>
<p>शायद इसीलिए निकोलाई चेर्नीशेव्स्की ने <a href="http://srijanshilpi.com/?p=27">कहा</a> है कि &#8220;अच्छी जिंदगी केवल कमीनों के लिए होती है, उनके लिए नहीं जो ईमानदार हैं&#8221;।</p>
<p>आप क्या सोचते हैं?</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=171</wfw:commentRss>
		<slash:comments>8</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=162</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=162#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 06 Jun 2009 13:54:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=162</guid>
		<description><![CDATA[जिंदगी की राह में मिले अच्छे-बुरे अनुभवों के खट्टे-मीठे रंगों के कोलाज हम सब के मन में बनते-मिटते रहते हैं, लेकिन जब हम किसी कहानी के पात्रों के प्रिज्म से होकर उन्हें देखते हैं तो उन कोलाजों में से उभरती कुछ नायाब शक्लें स्मृति-पटल पर टँग जाती हैं। अच्छी कहानियों को पढ़ते हुए जिंदगी के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जिंदगी की राह में मिले अच्छे-बुरे अनुभवों के खट्टे-मीठे रंगों के कोलाज हम सब के मन में बनते-मिटते रहते हैं, लेकिन जब हम किसी कहानी के पात्रों के प्रिज्म से होकर उन्हें देखते हैं तो उन कोलाजों में से उभरती कुछ नायाब शक्लें स्मृति-पटल पर टँग जाती हैं। अच्छी कहानियों को पढ़ते हुए जिंदगी के सुख-दु:ख और किरदारों की मासूमियत एवं समझदारी आपस में घुल-मिलकर एक अलग किस्म का रसायन बन जाते हैं, जिसकी तासीर मोहक होती है, और पाठक उसके सम्मोहन में बंधा-बंधा कहानी के अंत तक अटूट कौतूहल के साथ उतराता चला जाता है।</p>
<p><img align="left" src="http://farm3.static.flickr.com/2465/3600782744_f82cc850c5_o.jpg" />मेरे अभिन्न मित्र और सहकर्मी <a href="http://www.blogger.com/profile/10182445212902267985">अनुज</a> ने इधर पिछले तीन-चार वर्षों में कुछ बेहतरीन कहानियाँ लिख डाली हैं। उनकी प्राय: हर कहानी छपने के साथ ही जबरदस्त चर्चा के केन्द्र में रही। हिन्दी कहानियों के सुधी पाठकों और सुस्थापित लेखकों ने उनकी लगभग हर कहानी को हाथों-हाथ लिया। हिन्दी कहानियों के क्षितिज में उभरे इस नवोदित कहानीकार ने जाने-माने आलोचकों को भी अपनी मितव्ययी भाषा के जादू, अनुभव-संसार की विविधता, समकालीन यथार्थ की नब्ज पर अचूक पकड़ और कहानी कहने के अपने निराले तटस्थ अंदाज से समवेत सराहना करने के लिए आंदोलित कर दिया है।</p>
<p><strong>भारतीय ज्ञानपीठ</strong> ने हाल ही में उनकी कहानियों के पहले संग्रह को प्रकाशित किया है। इस संग्रह का शीर्षक उनकी पहली कहानी &#8220;<a target="_blank" href="http://sachkahun.blogspot.com/2007/10/2.html">कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह</a>&#8221; को बनाया गया है। जेएनयू की पृष्ठभूमि पर लिखी इस बेहतरीन कहानी ने हालांकि अपने छपे जाने का लंबा इंतजार किया और इसी कारण अनुज के भीतर का कहानीकार किंचित देर से सामने आ सका। उर्वर संभावनाओं से भरे इस कहानीकार को पहली नजर में परखने का श्रेय <strong>रवीन्द्र कालिया</strong> को जाता है, जो <strong>वागर्थ</strong> के तत्कालीन संपादक थे और अब <strong>नया ज्ञानोदय</strong> के संपादक हैं। उन्होंने ही अनुज की ज्यादातर कहानियों को न सिर्फ प्रकाशित किया है, बल्कि अपनी चुटीली टिप्पणियों से उन्हें चर्चा में बनाए रखने में मदद की है।</p>
<div style="border-top: 7px solid #5c8a64; border-bottom: 7px solid #5c8a64; margin: 12px; font-weight: bold; font-size: 13pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 115%; padding-top: 7px; text-align: center">&#8220;अनुज की कहानी की विशेषता यह है कि इसमें मुख्य पात्र की परिस्थिति और परिणति के प्रति न उपहास है, न उच्छवास, मात्र वृतान्त है। पाठक अपनी तरह से क्रियायित होने को स्वतंत्र है।&#8230;.अनुज की यह तटस्थ शैली उन रचनाकारों से नितांत भिन्न है जो लेखक के साथ निर्देशक भी बन कर पाठक को शिक्षित करते चलते हैं।&#8221;</div>
<p>इस कहानी-संग्रह में उपर्युक्त पहली कहानी के अलावा <em>खूँटा</em>, <em>अनवर भाई नहीं रहे</em>, <em>भाई जी</em>, <em>बनकटा</em>  और <em>कुंडली</em> खास तौर पर चर्चित रहे हैं। इन कहानियों के अलावा <em>माइक्रावेव टावर</em>, <em>हंसा रे</em>, <em>खड़ेसरी बाबा</em> और <em>काम्सोमोल कोटा</em> भी पाठकों द्वारा खूब पसंद किए गए हैं। इनमें से खास तौर पर <em>&#8216;खूँटा&#8217;</em> हिन्दी कहानी के इतिहास की श्रेष्ठतम कहानियों में शुमार करने लायक कही जा सकती है। इस कहानी में जिस तरह से ठेठ ग्रामीण परिवेश का और सोनपुर के पशु मेले का सजीव चित्रण हुआ है, वह प्रेमचंद के <em>दो बैलों की कथा</em> की याद दिलाता है।</p>
<p>&#8216;<em>अनवर भाई नहीं रहे</em>&#8216; सरकारी दफ्तर के माहौल और वहां के कर्मचारियों की मानसिकता और उनके बीच चलने वाली राजनीति को उजागर करने वाली कहानी है, जो कहानीकार के खुद के यथार्थ अनुभवों पर आधारित है। &#8216;<em>माइक्रोवेव टावर</em>&#8216; सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि पर है, जबकि &#8216;<em>हंसा रे</em>&#8216; शहरी जनजीवन में मध्य वर्ग की तस्वीर उकेरने वाली कहानी है, &#8216;<em>खड़ेसरी बाबा</em>&#8216; आजकल के साधुओं के ठगी के कारोबार पर है, &#8216;<em>बनकटा</em>&#8216; में बेटियों के पिता की मानसिक त्रासदी का चित्रण हुआ है, &#8216;<em>काम्सोमोल कोटा</em>&#8216; कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर एक कामरेड के क्षोभ की कथा है।</p>
<p>ममता कालिया के शब्दों में, &#8220;अनुज की कहानी की विशेषता यह है कि इसमें मुख्य पात्र की परिस्थिति और परिणति के प्रति न उपहास है, न उच्छवास, मात्र वृतान्त है। पाठक अपनी तरह से क्रियायित होने को स्वतंत्र है।&#8230;.अनुज की यह तटस्थ शैली उन रचनाकारों से नितांत भिन्न है जो लेखक के साथ निर्देशक भी बन कर पाठक को शिक्षित करते चलते हैं।&#8221;</p>
<p><strong>लेखक &#8211; अनुज<br />
प्रकाशक &#8211; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली-3<br />
पृष्ठ &#8211; 120<br />
मूल्य &#8211; 120 रुपये<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=162</wfw:commentRss>
		<slash:comments>9</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सपनों के रहस्य-लोक की परतें</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=161</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=161#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 01:30:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[निजी डायरी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=161</guid>
		<description><![CDATA[अपने एक मित्र से मिलने गया था। उनके कार्यालय की दीवार पर टँगे एक वाक्य पर नज़र गई। लिखा था, &#8220;सपने वे नहीं होते जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते।&#8221; उस वाक्य में निहित प्रेरणा देर तक मन में गूंजती रही। किंतु फिलहाल, मैं उन्हीं सपनों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अपने एक मित्र से मिलने गया था। उनके कार्यालय की दीवार पर टँगे एक वाक्य पर नज़र गई। लिखा था, <strong>&#8220;सपने वे नहीं होते जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते।&#8221;</strong> उस वाक्य में निहित प्रेरणा देर तक मन में गूंजती रही। किंतु फिलहाल, मैं उन्हीं सपनों की बात कर रहा हूँ जो हम सोते समय देखते हैं, उनकी नहीं जो हमें सोने नहीं देते।</p>
<p>सपने मुझे अक्सर हैरान करते रहे हैं।<br />
 <br />
बायीं कलाई में मोच आ जाने की वज़ह से एक अरसे तक दर्द से परेशान रहा। तकरीबन महीने भर फिजियोथिरैपी और अल्ट्रा-सोनिक थिरैपी चली, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। डिजिटल एक्स-रे से भी डॉक्टर को किसी &#8216;डिस्लोकेशन&#8217; का पता नहीं चला। डॉक्टर ने नुस्ख़े में पहले पेन-किलर गोलियाँ और बाद में, इंजेक्शन लेने की सलाह दी। कंप्यूटर की-बोर्ड का इस्तेमाल कम-से-कम करने और कलाई पर क्रेप-बैंड बांध कर रखने को भी कहा। सारे उपाय आजमा कर देख लिए, मगर दर्द दूर होने का नाम नहीं ले रहा था।  </p>
<p>दर्द से अधिक मुझे दर्द की वज़ह के इलाज की जरूरत थी। आयुर्वेद के विशेषज्ञ को दिखलाया तो उन्होंने पुनर्नवा के सेवन और क्षीर बला तेल से मालिश की सलाह दी। उससे भी कोई खास लाभ नहीं हुआ।</p>
<p>यदि अपने गाँव में रह रहा होता तो मुझे विश्वास है कि पड़ोस की बुढ़िया नानी इस दर्द को मिनट भर में ठीक कर दी होती। बचपन में खेलते हुए या फिसल कर गिरने से जब कभी हाथ-पैर में इस तरह की मोच आई तो माँ फौरन उनके पास ले जाती थीं। वह हाथों से टटोलकर &#8216;डिस्लोकेलन&#8217; का पता लेती थी और मुझे बातों में उलझा कर एक झटके में &#8216;कट&#8217; से पसली को यथास्थान बिठा देती थी और एक-दो बार की मालिश के बाद दर्द पूरी तरह से गायब हो जाया करता था।</p>
<p>मगर यहां दिल्ली में, बड़े अस्पतालों के विशेषज्ञ डॉक्टर इस साधारण-से दर्द का सही उपचार नहीं कर पा रहे थे। हारकर मैंने डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया और दवा लेनी भी बंद कर दी। पर हाथों का सूक्ष्म व्यायाम और मालिश करना जारी रखा। हालांकि कलाई को क्लॉक-वाइज और एंटी क्लॉक-वाइज घुमाने में भी दर्द होता था और मुट्ठी बंद कर पाना भी कठिन था।</p>
<p>मगर परसों रात गज़ब हो गया। सपने के दौरान किसी अज्ञात प्रेरणा से मेरे दाहिने हाथ ने बायें हाथ की कलाई को अचानक एक खास कोण पर &#8216;खट&#8217; से मोड़ दिया। मेरी नींद खुल गई और जब मैंने कलाई को दबा कर, तरह-तरह से मोड़ कर देखा तो दर्द पूरी तरह से गायब हो चुका था। </p>
<p>तो क्या मेरे अवचेतन मन को कलाई के उस खास कोण का पता था जहां डिस्लोकेशन था और क्या सपने के दौरान उसी ने दाहिने हाथ को उतने सटीक रूप-से निर्देशित कर दिया था?</p>
<p>एक दूसरी घटना भी याद आ रही है। कंप्यूटर पर इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड से अभी जो मैं हिन्दी में टाइप कर रहा हूँ, उसका अभ्यास भी सपने में ही हुआ था। अख़बार की नौकरी के दौरान पहली बार जब कंप्यूटर पर खुद से टाइप कर आलेख तैयार करना था तो साथियों से पूछ-पूछकर मैंने काग़ज पर की-बोर्ड का लेआउट बना लिया और उसे देख-देखकर आलेख टाइप कर लिया था। मगर रात को लौटकर घर आने के बाद नींद में सपने के दौरान भी टाइपिंग जारी रही। अगले दिन ऑफिस में कंप्यूटर पर जब काम करना शुरू किया तो इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड पर मेरी टंकण गति सहज हो चुकी थी। जबकि दूसरे ज्यादातर लोगों को इंस्क्रिप्ट पर सहज होने में अमूमन कुछ सप्ताह तो लग ही जाते हैं।</p>
<p>ड्राइविंग सीखने के शुरुआती दिनों में मुझे टॉप गियर लगाने में बड़ी दिक्कत हो रही थी। चौथे गियर से पाँचवे गियर में जाने के बजाय अक्सर थर्ड गियर लग जाया करता था। एक रात सपने में ड्राइविंग करते हुए टॉप गियर का अभ्यास हो गया। सुबह ऑफिस जाते हुए मैं बड़ी सहजता से बारंबार टॉप गियर लगा पा रहा था।</p>
<p>स्कूल के दिनों में जब इम्तहान का दौर चलता था तो कभी-कभी नींद में भी परीक्षा के सपने आ जाते थे। जब कभी ऐसे सपने आते थे तो अगले दिन का पेपर बहुत अच्छा जाता था। ऐसा लगता था कि सपने में उन प्रश्नों का अभ्यास पहले ही हो चुका है।</p>
<p>लेकिन एक स्वप्न तो वाकई अदभुत था। वर्षों तक कुछ दार्शनिक जिज्ञासाओं ने मेरे मन को मथ रखा था। दीवानों की तरह मैं दिन-रात किताबों में उन सवालों के हल खोजता रहता था। जब किताबें व्यर्थ मालूम पड़ने लगीं तो घंटों ध्यान की गहराइयों में उतर कर समाधान पाने की चेष्टा भी करता था। मगर एक रात सपने के दौरान एक विलक्षण अनुभूति से गुजरा और उसके बाद ऐसा लगा कि सारी गुत्थियाँ सुलझ गईं हैं।  </p>
<p>ऐसे दर्जनों स्वप्न हैं जिनकी अनुभूति मेरे चेतन मन पर आज भी छाई हुई हैं। कई बार उनसे प्रत्यक्ष जीवन की ऐसी समस्याओं के समाधान भी प्राप्त हुए हैं जिनके लिए मेरे सारी कोशिशें विफल हो चुकी थीं।<br />
 <br />
हम अपनी एक-तिहाई जिंदगी सोते हुए बिताते हैं और कुल जीवन का छठा भाग सपने देखते हुए गुजार देते हैं, मगर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dream" target="_blank">सपनों</a> के बारे में हम बहुत ज्यादा नहीं जानते। हमें ज्यादातर सपने याद नहीं रह पाते। अपने सपनों की अक्सर हम परवाह नहीं करते। ज्यादातर सपने नजरंदाज करने लायक होते भी हैं, पर कुछ ऐसे सार्थक सपने भी होते हैं, जिनमें हमारी जिंदगी की गुत्थियों को सुलझाने की कुंजी छिपी होती है। इन्हें मनोवैज्ञानिक शब्दावली में सचेतन स्वप्न या <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Lucid_dreaming" target="_blank">Lucid Dreaming</a> कहा जाता है।</p>
<p>इन सपनों की खासियत यह होती है कि इन्हें देखते समय द्रष्टा को यह भान भी बना रहता है कि वह स्वप्न देख रहा है और उस दौरान वह मानसिक और कुछ हद तक शारीरिक रूप से भी सक्रिय रहता है। स्वप्न-भंग के बाद उसे किसी अचंभे का अहसास नहीं होता। जागृति के बाद भी स्वप्न की स्मृति बनी रहती है और स्वप्न के दौरान घटे विचार-क्रम या घटनाक्रम का प्रभाव बाद में भी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है।  </p>
<p>हम जिस स्थूल लोक में रहते हैं और जिस सूक्ष्म लोक से नियंत्रित होते हैं, कई बार ऐसा लगता है कि सपने उन दोनों लोकों के बीच संवाद-संपर्क-संबंध के सेतु हों। हम जितना ही अपने सपनों के प्रति सजग होते हैं, उतना ही अपने को, अपने जीवन के मक़सद को बेहतर समझ पाते हैं। दुनिया के रंगमंच पर हमारी अपनी भूमिका क्या हो, कैसी हो, इसके सबसे सही सूत्र हमें अपने सपनों से ही प्राप्त हो सकते हैं।</p>
<p>सपनों के रहस्य-लोक में हम जितने गहरे उतरते हैं, ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा और कला के क्षेत्र के अनोखे और अपूर्व सूत्र हाथ लगते हैं। फ्रायड, जुंग, एडलर, पर्ल्स, हॉब्सन, मैककार्लि, सोल्म्स, झांग, फेरेंस्ज़ी, ग्रिफिन, हॉल जैसे आधुनिक स्वप्नविदों (oneirologist) के प्रयासों के कारण सपनों के तिलिस्म की दुनिया कुछ-कुछ खुलने लगी है। मगर अब भी यह दुनिया मानव के लिए काफी हद तक अबूझ पहेली ही बनी हुई है। स्वप्न-सागर की अतल गहराइयों में छिपे अनगिनत ज्ञान-रत्नों को प्रकाश में लाने के लिए निरंतर सघन और व्यवस्थित अध्ययन की जरूरत है।</p>
<p>क्या आप भी कभी अपने सपनों को लेकर हैरान हुए हैं? क्या सपनों ने कभी आपको जीवन की राह दिखाई है? 
</p>
<p><strong>कुछ अन्य आलेख :</strong><br />
<a href="http://srijanshilpi.com/?p=136" target="_blank">नींद और जागरण</a><br />
<a href="http://srijanshilpi.com/?p=131" target="_blank">कला, कलाकार और कल्पना</a><br />
<a href="http://srijanshilpi.com/?p=37" target="_blank">मौन: सत्य का द्वार</a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=161</wfw:commentRss>
		<slash:comments>12</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>आरक्षण: जंग अभी जारी है&#8230;</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=160</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=160#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 15:45:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[जन सरोकार]]></category>
		<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>
		<category><![CDATA[संविधान और विधि]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=160</guid>
		<description><![CDATA[&#8216;यूथ फॉर मेनटेनिंग अन-इक्वलिटी&#8217; के उत्साही युवक आरक्षण-विरोध के प्रायोजित अभियान में सुप्रीम कोर्ट का जिस तरह से इस्तेमाल करना चाह रहे थे, वैसा तो हरगिज मुमकिन नहीं था। आरक्षण के मुद्दे पर फैसला करते समय सुप्रीम कोर्ट को न सिर्फ अपनी साख और मर्यादा का ख्याल रखना था, बल्कि लोकतंत्र के दूसरे संवैधानिक स्तंभों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;यूथ फॉर <strike>मेनटेनिंग अन-</strike>इक्वलिटी&#8217; के उत्साही युवक आरक्षण-विरोध के प्रायोजित अभियान में सुप्रीम कोर्ट का जिस तरह से इस्तेमाल करना चाह रहे थे, वैसा तो हरगिज मुमकिन नहीं था। आरक्षण के मुद्दे पर फैसला करते समय सुप्रीम कोर्ट को न सिर्फ अपनी साख और मर्यादा का ख्याल रखना था, बल्कि लोकतंत्र के दूसरे संवैधानिक स्तंभों से सीधे टकराव को भी टालना था। मगर कोर्ट के <a href="http://in.rediff.com/news/2008/apr/10indu.htm" target="_blank">इस फैसले में</a> आरक्षण-विरोधियों को जंग जारी रखने के लिए कुछ ऐसे नुक्ते छोड़ दिए गए हैं जिनके आधार पर वे आगे की मोर्चेबंदी में जुट सकते हैं।</p>
<p><strong>सरकार की नीयत में खोट</strong></p>
<p>हालांकि आरक्षण की इस जंग में सरकार ने भी उस ईमानदार नीयत और नैतिक साहस का परिचय कभी नहीं दिया, जो प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा सामाजिक न्याय के महान संवैधानिक आदर्श को साकार करने के लिए विधि-सम्मत प्रावधान करते समय उसे दिखानी चाहिए थी। वोटबैंक की अवसरवादी मानसिकता के कारण इस मसले पर सरकार और राजनीतिक दल प्रखर तेवर दिखा सकने की स्थिति में नहीं थे और इसलिए अदालत भी उनके इरादे पर शक करती रही।</p>
<p><strong>नेपथ्य के असली खिलाड़ी</strong></p>
<p>आरक्षण-विरोध के अभियान की असली कमान निजी क्षेत्र में शिक्षा की ऊँची दुकान चलाने वाले जिन देशी और विदेशी पूँजीपतियों के हाथ में थी, वे तो नेपथ्य में रहकर कठपुतलियाँ नचा रहे थे और अपने इरादे में वे शायद काफी हद तक कामयाब भी रहे हैं। आरक्षण नीति के कार्यान्वयन के तीसरे चरण में निजी क्षेत्र में आरक्षण की शुरुआत की आशंका से घबराए हुए ये लोग ही आरक्षण-विरोध के मुख्य प्रायोजक थे। परंतु कोर्ट में इस मुद्दे पर पार्टी बन सकने का अवसर उन्हें उपलब्ध नहीं था, क्योंकि सरकार ने निजी क्षेत्र में आरक्षण की दिशा में कोई वास्तविक कदम अभी तक उठाया ही नहीं है। मगर सीधे रूप से खुद पार्टी न होते हुए भी और विवाद में प्रत्यक्ष रूप से शामिल न रहते हुए भी वे कोर्ट के रुख को प्रच्छन्न रूप से अपने हितों के अनुकूल प्रभावित करने में सफल रहे।</p>
<p><strong>मीडिया ने दिखाई नंगई</strong></p>
<p>मगर इस पूरे खेल में सबसे अधिक नंगई मीडिया ने दिखाई। जैसे नाचते-नाचते किसी तवायफ का मेक-अप पसीने से उतर जाता है और अचानक वह बेहद बदसूरत नजर आने लगती है, आरक्षण के मुद्दे पर कवरेज करते और बहस चलाते पत्रकारों का हाल भी ठीक वैसा ही हुआ। उनकी कलई खुल गई और बची-खुची साख भी जाती रही। संविधान, संसद, सरकार और बहुमत के खिलाफ खुलकर खड़े होकर आरक्षण-विरोध का माउथपीस बनते समय यदि वे भारतीय समाज के ऐतिहासिक सत्य और पत्रकारिता के स्थापित मानदंडों का तनिक भी ख्याल रखते तो शायद उनमें थोड़ी शर्म बाकी रह जाती और वे अपने स्तर से इस हद तक नहीं गिरते।</p>
<p><strong>उल्टी बही बयार</strong></p>
<p>यदि सत्ताधारी राजनीतिक दल और उनके नेता वाकई सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित होते तो पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की शुरुआत करने में चार दशकों की देर नहीं हुई होती। चार दशकों के विलंब के बाद अगस्त, 1990 में जब पिछड़ों के लिए आरक्षण की नीति लागू की गई तब भी उसे पूरी तरह से अपनाने की बजाय किस्तों में अपनाया गया। यदि इसे तब भी पूरी तरह अपना लिया गया होता तो वह राजनीतिक दलों के लिए वोटबैंक का दीर्घकालिक अवसरवादी हथियार नहीं बन पाता और आरक्षण का मकसद भी काफी हद तक साकार हो जाता।</p>
<p>अगर किस्तों में ही आरक्षण लागू करने की स्थिति थी, तो पहले शिक्षा में आरक्षण लागू किया जाना चाहिए था और बाद में रोजगार में आरक्षण लागू किया जाता। लेकिन आरक्षण को एक साथ सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में लागू किया जाना जरूरी था, ताकि आरक्षण का मूल मकसद पूरी तरह से हासिल हो पाता, वैसी परिस्थिति शीघ्र हासिल हो पाती, जब आरक्षण की जरूरत न रह जाए।</p>
<p><strong>आरक्षण की समीक्षा और क्रीमीलेयर की छँटाई</strong></p>
<p>सुप्रीम कोर्ट के फैसले में समय-समय पर आरक्षण की समीक्षा किए जाने और क्रीमीलेयर को आरक्षण नहीं दिए जाने की जो बात कही गई, वह सर्वथा उचित और स्वागतयोग्य है। दरअसल, आरक्षण का प्रावधान जिस उद्देश्य के लिए लागू किया गया है, वह किस हद तक और किस गति से पूरा हो रहा है, यह देखा जाना बहुत जरूरी है। लेकिन पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का विरोध करने वाले तत्व एक रणनीति के तहत दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण को निर्बाध रूप से जारी रखने के पक्षधर बन गए हैं। इसलिए हमारे यहां आरक्षण की नीति के दोहरे मानदंड प्रचलित हैं।</p>
<p>अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए न सिर्फ पदोन्नति में भी आरक्षण पिछले पचास वर्ष से लागू है, बल्कि उनके लिए क्रीमीलेयर का सिद्धांत भी लागू नहीं होता। जबकि होना यह चाहिए कि आरक्षण का लाभ जिसे भी मिले, उसकी एक निश्चित अंतराल पर समीक्षा हो, जिसमें ऐसे परिवारों की पहचान की जाए, जो आरक्षण का लाभ उठाने के बाद क्रीमीलेयर में आ चुके हैं और जिन्हें अब आगे आरक्षण के लाभ की जरूरत नहीं है।</p>
<p>लेकिन जो छात्र आरक्षण का लाभ लिए बगैर योग्यता सूची में सामान्य श्रेणी के छात्रों की कतार में सफलता हासिल करते हैं, उनको अपने कैरियर के दौरान पदोन्नति के कम-से-कम एक अवसर पर आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए या फिर उनकी संतान को क्रीमीलेयर के अंतर्गत शामिल नहीं माना जाना चाहिए और उसे आरक्षण का लाभ ले सकने का विकल्प मिलना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि उच्च शिक्षा में आरक्षण लागू करते समय क्रीमीलेयर की परिभाषा के अंतर्गत परिवार की शैक्षणिक पृष्ठभूमि का विशेष रूप से ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि पिछड़े वर्गों के कई परिवार भले ही आर्थिक दृष्टि से संपन्न माने जाते हों, पर शैक्षणिक-सांस्कृतिक दृष्टि से वे अत्यंत बदहाल होते हैं।</p>
<p>इसके अलावा, क्रीमीलेयर की परिभाषा के आर्थिक आधार को भी अधिक यथार्थवादी बनाए जाने की जरूरत है। मुद्रास्फीति की मौजूदा दर को देखते हुए पांच लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाले परिवारों, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, संवैधानिक पदों पर आसीन अन्य व्यक्तियों और ग्रुप &#8216;ए&#8217; श्रेणी में सीधी भर्ती वाले राजपत्रित अधिकारियों की संतानों को छोड़कर पिछड़े वर्ग के अन्य सभी समुदायों को आरक्षण का लाभ लेने का अवसर दिया जाना चाहिए।</p>
<p><strong><u>आरक्षण से संबंधित मेरे पिछले लेख</u></strong></p>
<ul>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/?p=18" target="_blank">पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण पर बहस</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/?p=22" target="_blank">आरक्षण बनाम योग्यता</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/?p=24" target="_blank">आरक्षण : विरोध के बावजूद</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/?p=21" target="_blank">प्रायोजित आरक्षण विरोध का पर्दाफाश</a></li>
</ul>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=160</wfw:commentRss>
		<slash:comments>12</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>धर्म, राजनीति और हम</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=159</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=159#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 07 Mar 2008 01:40:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[चिट्ठाकारिता]]></category>
		<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=159</guid>
		<description><![CDATA[जड़ प्रकृति के पिंडों के बीच जिस प्रकार आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल सर्वदा एक साथ क्रियाशील रहते हैं जिनके कारण उनके बीच एक संतुलन बना रहता है, ठीक वैसे ही आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल चेतन प्रकृति के जीवों के बीच भी सदा क्रियाशील रहते हैं जो सृष्टि चक्र में संतुलन बनाए [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जड़ प्रकृति के पिंडों के बीच जिस प्रकार आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल सर्वदा एक साथ क्रियाशील रहते हैं जिनके कारण उनके बीच एक संतुलन बना रहता है, ठीक वैसे ही आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल चेतन प्रकृति के जीवों के बीच भी सदा क्रियाशील रहते हैं जो सृष्टि चक्र में संतुलन बनाए रखते हैं। यहाँ हम समस्त जीवों के बजाय यदि केवल मानव समाज के संदर्भ में ही इस सिद्धांत की चर्चा करें, तो इस गुत्थी को बेहतर समझ सकेंगे। और जब इस गुत्थी को समझ लेंगे तो समकालीन समस्याओं के व्यावहारिक हल तलाशना भी सुगम होगा।</p>
<div style="border-top: 7px solid #5c8a64; border-bottom: 7px solid #5c8a64; margin: 12px; font-weight: bold; font-size: 13pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 115%; padding-top: 7px; text-align: center">मानव चेतना भी आकर्षण और प्रतिकर्षण के इन दो बलों के परस्पर द्वन्द्व से संचालित होती है। आकर्षण का जो बल दो मनुष्यों की चेतना को आपस में जोड़ता है उसे &#8220;धर्म&#8221; कहते हैं, और प्रतिकर्षण का जो बल दो मनुष्यों की चेतना को एक-दूसरे से दूर करता है, उसे &#8220;अधर्म&#8221; यानी आधुनिक अर्थों में &#8220;राजनीति&#8221; कहते हैं।</div>
<p>मानव चेतना भी आकर्षण और प्रतिकर्षण के इन दो बलों के परस्पर द्वन्द्व से संचालित होती है। आकर्षण का जो बल दो मनुष्यों की चेतना को आपस में जोड़ता है उसे &#8220;धर्म&#8221; कहते हैं, और प्रतिकर्षण का जो बल दो मनुष्यों की चेतना को एक-दूसरे से दूर करता है, उसे &#8220;अधर्म&#8221; यानी आधुनिक अर्थों में &#8220;राजनीति&#8221; कहते हैं। धर्म की बुनियाद है प्रेम, लगाव, समानता। इसके विपरीत अधर्म यानी राजनीति की बुनियाद है, टकराव, अलगाव, भिन्नता। जो प्रेरक भाव हमें एकत्व की ओर ले जाता है, एक-दूसरे से जुड़ने के लिए उत्साहित करता है, वही धर्म है।  और, जो भाव हमारे भीतर अपनी विशिष्टता की अलग पहचान का आग्रह भरता है, अपने को दूसरे से बेहतर, महत्तर जताने, एक-दूसरे से आजाद करने के लिए सचेष्ट करता है, वही राजनीति है। यदि आप &#8220;धर्म&#8221;, &#8220;अधर्म&#8221; और &#8220;राजनीति&#8221; शब्दों के पारंपरिक अर्थों के बजाय उन्हें सर्वथा नवीन संदर्भ में ग्रहण कर सकें तो इसे बेहतर समझ सकेंगे।</p>
<p>सामाजिक गतिकी में संतुलन के लिए धर्म और राजनीति, दोनों का एक साथ सम्यक अनुपात में सक्रिय होना अपरिहार्य है। डॉ. राममनोहर लोहिया इसे दूसरे तरीके से कहते थे, <strong>&#8220;राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति&#8221;</strong>। समाज केवल धर्म के सहारे या केवल राजनीति के जरिए नहीं चल सकता। दोनों के बीच अनुपात का संतुलन आवश्यक है। जब कभी यह संतुलन गड़बड़ाता है तो समाज भयंकर समस्याओं से परेशान हो जाता है और उस संतुलन को फिर से कायम करने के लिए किसी शक्तिसंपन्न चेतना को सामाजिक द्वंद्व में हस्तक्षेप करने के लिए सक्रिय होना पड़ता है। इसी बात को गीता में श्रीकृष्ण की सर्वाधिक चर्चित अभिव्यक्ति, <strong>&#8220;यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥&#8221;</strong> में भी उदघाटित किया गया है।</p>
<p>जिस व्यक्ति के प्रति हम जुड़ाव, लगाव महसूस करते हैं उनसे एक रिश्ता बना लेते हैं या जिनके साथ हमारा एक रिश्ता होता है, उनके प्रति हम जुड़ाव, लगाव महसूस करने लगते हैं। इस रिश्ते को शिद्दत के साथ निभाने, इस लगाव को परवान तक चढ़ाने को ही धर्म कहते हैं। लेकिन रिश्तों के बीच, आपसी लगाव के संबंधों के बीच ही एक ऐसा कारक भी सक्रिय रहता है जो उनमें दरार डालने का, अलगाव पैदा करने का, दूरी बढ़ाने का काम करता है, जिसे राजनीति कहते हैं। यदि यह राजनीति न हो तो समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का लोप हो जाएगा और सामाजिक जीवन की गतिशीलता नष्ट हो जाएगी। हर परिवार में, हर देश में टकराव की परिस्थितियां पैदा होती रहती हैं और वे अलग-अलग भागों में विभक्त होते रहते हैं। लेकिन उनके बीच आपसी जुड़ाव के तंतु भी समानांतर रूप से सक्रिय रहते हैं। मानव समाज के अस्तित्व का विकास-क्रम तभी तक स्थायी रह सकता है जब तक मनुष्यों के बीच आपसी लगाव और अलगाव को प्रेरित करने वाले भाव संतुलित अनुपात में रहें।</p>
<p>समकालीन दौर में मानव समाज जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है, उसके कारण धर्म और राजनीति के बीच का आनुपातिक संतुलन बिगड़ गया है। राजनीति प्रबल हो रही है और धर्म शिथिल हो रहा है। मनुष्यों के बीच आपसी अलगाव, टकराव बढ़ रहा है और लगाव, अपनत्व कम हो रहा है। राजनीतिबाज यानी &#8220;दुष्कृत&#8221; लोग जनमानस में जुड़ाव, लगाव के सहज भाव को क्षोभित करके उनके बीच टकराव, अलगाव पैदा करने की चेष्टा में लगे हैं।</p>
<p>यह सब इस समय पूरी दुनिया में, हर देश में, हर जाति में, हर वर्ग में चल रहा है। अपने देश में हम इन दिनों राज -बाल ठाकरे को मराठी-बिहारी की राजनीति करके आपसी सदभाव बिगाड़ने की कुचेष्टा करते देख ही रहे हैं। यहां तक कि हिन्दी चिट्ठा जगत में भी ऐसे अवि&#8230; &#8211; मसि&#8230; टाइप राजनीतिबाज सक्रिय हैं जो <strong>&#8220;साधुवाद के दौर के अंत&#8221;</strong> के उदघोष के साथ चिट्ठाकारों के बीच आपसी टकराव को हवा देने में जोर-शोर से जुटे हुए हैं। यह सही है कि यदि वे न होते तो चिट्ठाकारी में जो गतिशील विकास देखने को मिल रहा है वह उस रूप में उभर कर सामने नहीं पाता। परंतु क्या आपको नहीं लगता कि साधुवादियों और टकराववादियों के बीच संतुलन अब इस कदर बिगड़ने लगा है कि इसमें किसी समर्थ हस्तक्षेप की जरूरत है?</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=159</wfw:commentRss>
		<slash:comments>8</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>बाजार-सरकार बनाम जन-सहकार</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=158</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=158#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 02 Mar 2008 01:06:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[जन सरोकार]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=158</guid>
		<description><![CDATA[चार बजट नोट कमाने के लिए और एक बजट वोट पाने के लिए। पांच साल की सत्ता के दौरान चार साल बाजार के साथ ताल में ताल मिलाने के बाद पांचवें साल वोटर की तरफ मुखातिब होना लोकतंत्र में सरकार की मजबूरी है। चुनाव में उतरकर जनता से समर्थन मांगने की यह मजबूरी यदि सरकार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>चार बजट नोट कमाने के लिए और एक बजट वोट पाने के लिए। पांच साल की सत्ता के दौरान चार साल बाजार के साथ ताल में ताल मिलाने के बाद पांचवें साल वोटर की तरफ मुखातिब होना लोकतंत्र में सरकार की मजबूरी है। चुनाव में उतरकर जनता से समर्थन मांगने की यह मजबूरी यदि सरकार के सामने न हो तो देश को कंपनीराज में पूरी तरह तब्दील हो जाने में इतनी देर न लगे।</p>
<p>मगर बाजार और सरकार की जुगलबंदी चार वर्षों तक अपने बेसुरे राग से आम जनता के मिजाज को इतना परेशान कर चुकी होती है कि आख़िरी बजट के लुभावन आलाप के बाद भी उसके हाथ ताली बजाने के लिए खुल नहीं पाते। इस जुगलबंदी से बाजार में इतनी मंहगाई बढ़ चुकी होती है और सरकार में इतना भ्रष्टाचार बढ़ चुका होता है कि आखिरी बजट में जब मतदाताओं का ख्याल करते हुए हालात को थोड़ा संभालने की कवायद की जाती है तो जनता उससे राहत महसूस नहीं कर पाती। इसलिए पांच साल के बाद जब सरकार चुनाव में उतरती है तो जनता उसे नकारते हुए उसका चेहरा बदलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर देती है।</p>
<p>हालांकि सरकार का चेहरा बदल देने के सिवाय जनता के वश में कुछ और होता नहीं। दरअसल वह सरकार का चेहरा भी नहीं बदल पाती। वह सिर्फ उसका मुखौटा बदल पाती है। सरकार को अंदर से बदलने की क्षमता तो बाजार के पास है । हमने देखा है कि पिछले दो दशकों में बाजार ने सरकार को कैसे अंदर से पूरी तरह बदल कर रख दिया है और अलग-अलग सरकारें किस तरह बाजार के हाथों की कठपुतली बनकर नाचती रही हैं।</p>
<p>बाजार और सरकार, दोनों के वजूद भले ही जनता के बल पर कायम हों, मगर बाजार के लिए जनता सिर्फ उपभोक्ता है, और सरकार के लिए वह सिर्फ मतदाता। बाजार को उससे मुनाफा चाहिए, सरकार को उससे सत्ता चाहिए। इसलिए दोनों मिलकर जनता को उल्लू बनाते हैं और अपना-अपना उल्लू सीधा करते हैं।</p>
<div style="border-top: #5c8a64 7px solid; font-weight: bold; font-size: 13pt; float: right; padding-bottom: 7px; margin: 12px; width: 200px; line-height: 115%; padding-top: 7px; border-bottom: #5c8a64 7px solid; text-align: center">जनता को उस औजार की दरकार है जिससे वह बाजार और सरकार के बीच के अनैतिक गठजोड़ को तोड़ सके और उन्हें अपने हितों के अनुरूप काम करने के लिए बाध्य कर सके। वह औजार एक ही है &#8211; जनता के बीच सहज आपसी सहकार, जिसके बल पर वह चाहे तो सरकार और बाजार, दोनों को अपनी अंगुलियों पर नचा सकती है।</div>
<p>जनता को उस औजार की दरकार है जिससे वह बाजार और सरकार के बीच के अनैतिक गठजोड़ को तोड़ सके और उन्हें अपने हितों के अनुरूप काम करने के लिए बाध्य कर सके। वह औजार एक ही है- जनता के बीच सहज आपसी सहकार, जिसके बल पर वह सरकार और बाजार, दोनों को अपनी अंगुलियों पर नचा सकती है। यही वह ब्रह्मास्त्र है जिसके द्वारा वह अपनी खुशहाली, आजादी और शांति हासिल कर सकती है। बाजार और सरकार की संगठित ताकतों के अन्याय से मुकाबला करने के लिए उसे खुद को संगठित करना पड़ेगा।</p>
<p>आपस में संगठित होने की बजाय जनता अभी तक प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था पर भरोसा करती रही है कि वे संविधान के अनुरूप कार्य करते हुए जनता के हितों की रक्षा करेंगे। मगर अब उसे प्रशासन और न्याय तंत्र के तेजी से बदल रहे चरित्र को अच्छी तरह से समझ लेना होगा जो अब भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुकी है और केवल सरकार और बाजार के मोहरे की तरह काम कर रही है। वे अब जनता के हितों की रक्षा करने के लिए आगे नहीं आएंगे।<br />
इसके अलावा, जनता को अपने बीच मौजूद ऐसे तत्वों की पहचान भी करनी होगी जो दरअसल बाजार और सरकार के दलाल या एजेंट के रूप में काम करते हैं। ये एजेंट तरह-तरह की भूमिका में हो सकते हैं। वे पत्रकार, कलाकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता या धर्म प्रचारक का भी नकाब ओढ़े हो सकते हैं। ये जनता के ध्यान को इधर-उधर की व्यर्थ सतही बातों, फिजूल की बहस और मनबहलाव में उलझाए रखते हैं और उनके हित के असली मुद्दों से भटकाए रखते हैं।</p>
<p>जनता अपने बीच छिपे इन दलालों को पहचानकर उनसे पीछा छुड़ा ले और आपसी सहकार से जीना, रहना और लड़ना शुरू कर दे तो वह दिन दूर नहीं जब बाजार और सरकार, दोनों उसके हाथों की कठपुतली होंगे। जनता के बीच हर स्तर पर, हर मंच पर आपसी सहकार अधिक से अधिक बढ़ना चाहिए। संगठित जनता ही बाजार और सरकार को अपनी शर्तों पर झुका सकती है और अपने हितों के लिए काम करने के लिए बाध्य कर सकती है।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=158</wfw:commentRss>
		<slash:comments>7</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>बेमौके के मीडिया अभियान के पीछे का माज़रा</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=157</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=157#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 25 Jan 2008 01:44:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[पत्रकारिता]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=157</guid>
		<description><![CDATA[यह महज संयोग से कुछ अधिक लगता है। इस चिट्ठे पर तीसरे मोर्चे से संबंधित पिछले लेख में कांग्रेस और भाजपा के बीच पनप रहे नापाक किस्म के दोस्ताने को खास तौर पर रेखांकित किया गया था। और, कांग्रेस का मीडिया प्रकोष्ठ इस तरह के दोस्ताने के सार्वजनिक होने के घातक असर को प्रभावशून्य करने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यह महज संयोग से कुछ अधिक लगता है। इस चिट्ठे पर तीसरे मोर्चे से संबंधित <a href="http://srijanshilpi.com/?p=156" target="_blank">पिछले लेख</a> में कांग्रेस और भाजपा के बीच पनप रहे नापाक किस्म के दोस्ताने को खास तौर पर रेखांकित किया गया था। और, कांग्रेस का मीडिया प्रकोष्ठ इस तरह के दोस्ताने के सार्वजनिक होने के घातक असर को प्रभावशून्य करने के अभियान में फौरन मुस्तैदी से जुट गया। कल हर <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/Rahul_snubs_Advani_on_private_encounter/rssarticleshow/2726219.cms" target="_blank">अख़बार</a> की <a href="http://economictimes.indiatimes.com/PoliticsNation/Rahul_takes_a_dig_at_Advani_BJP/articleshow/2726398.cms" target="_blank">सुर्खियों</a> में राहुल गाँधी अचानक यह <a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_4114589/" target="_blank">असहज स्पष्टीकरण देते नज़र आए</a> कि कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के प्रबल राजनीतिक विरोधी हैं और दोनों के बीच बुनियादी मतभेद हैं।</p>
<p>यह सफाई जिस संदर्भ में दी गई, उसका मूल प्रसंग तो पुराना पड़ चुका था और उसमें ऐसी कोई खास बात थी भी नहीं कि इतने दिनों बाद उस मामूली प्रसंग को लेकर इतना बड़ा मीडिया कैम्पेन चलाया जाए। हुआ यों था कि पिछले गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान दो माह पहले एक बार दिल्ली हवाई अड्डे पर अपने-अपने विमानों का इंतजार करते समय आडवाणी जी और राहुल गाँधी के बीच संयोग से मुलाकात हो गई थी। वैसे, संसद सत्रों के दौरान दोनों के बीच इस तरह का आकस्मिक आमना-सामना तो रोज ही होता है। परंतु, हवाई अड्डे के वीआईपी लाउंज में आडवाणी जी को सामने देख राहुल गाँधी शिष्टाचारवश अभिवादन करने जा पहुँचे थे। आडवाणी जी ने मौका देखकर कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल को यह समझाने की कोशिश की थी कि हम एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी हैं, शत्रु नहीं और हमें आपस में इसी तरह से व्यवहार करना चाहिए। आडवाणी जी को लगा होगा कि राहुल को यह बात खास तौर पर समझाने की जरूरत है। सोनिया जी और कांग्रेस के पुराने दिग्गज तो इसे बखूबी समझते ही हैं। पता नहीं क्यों, उस शिष्टाचार मुलाकात में हुई इस निजी बातचीत की ख़बरें भाजपा की ओर से मीडिया में प्रचारित भी कर दी गई।</p>
<p>कांग्रेस को उस समय तो नहीं, पर अब उस बात के बहाने भाजपा के साथ बढ़ रही उसकी अंदरुनी साँठ-गाँठ के सार्वजनिक हो जाने के घातक राजनीतिक असर का अहसास हो रहा है। कांग्रेस पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख वीरप्पा मोइली ने पत्रकारों के लिए लंच पार्टी का आयोजन किया और उसी के दौरान कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी ने कांग्रेस बीट कवर करने वाले अपने खास-खास पत्रकारों के माध्यम से आडवाणीजी के साथ हुई उस मुलाकात के सार्वजनिक होने के प्रतिकूल निहितार्थ और जनता के बीच गए विपरीत संदेश के असर को कम करने की कोशिश की और उस बातचीत को सार्वजनिक करने के लिए आडवाणी पर निशाना साधते हुए कहा कि &#8216;मेरी यह आदत नहीं है कि मैं निजी बातचीत को मीडिया के सामने जाहिर करूं।&#8217; बेमौके के इस मीडिया कैम्पेन का कोई और खास मक़सद नहीं था। लंच पार्टी के दौरान पत्रकारों के साथ राहुल की केवल अनौपचारिक बातें ही हुईं। पर प्राय: हर अख़बार की सुर्खियों ने राहुल गाँधी के मीडिया अभियान का सबूत चीख-चीख कर दिया।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=157</wfw:commentRss>
		<slash:comments>4</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>तीसरे मोर्चे की दस्तक</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=156</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=156#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 23 Jan 2008 06:28:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[जन सरोकार]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=156</guid>
		<description><![CDATA[यह साबित करने के लिए अलग से दलील, तथ्य और प्रमाण पेश करने की जरूरत नहीं रह गई है कि केन्द्र की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के अस्तित्व को बनाए रखने में सबसे बड़े मददगार बनते जा रहे हैं। यदि इन दोनों पार्टियों का वश चले तो वे तमाम अन्य दलों को राजनीति [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यह साबित करने के लिए अलग से दलील, तथ्य और प्रमाण पेश करने की जरूरत नहीं रह गई है कि केन्द्र की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के अस्तित्व को बनाए रखने में सबसे बड़े मददगार बनते जा रहे हैं। यदि इन दोनों पार्टियों का वश चले तो वे तमाम अन्य दलों को राजनीति के मैदान से खदेड़कर <strong>&#8220;इस बार मैं, अगली बार तू&#8221;</strong> वाला खेल दशकों तक जारी रखना चाहेंगे, जैसा कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में चलता रहा है। लेकिन क्षेत्रीय एवं छोटी-छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करके सत्ता में आने की मजबूरी के चलते उनकी राजनीति की दुकानें काफी अरसे से निर्बाध ढंग से नहीं चल पा रही हैं। अक्सर इन दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं के बयानों में इस बात की कसक और छटपटाहट छलक जाती है। पिछले वर्षों में कई बार यह दिखा कि सत्ता में रहते हुए जब कभी इन दोनों पार्टियों में से किसी को दूसरे की कमजोर नब्ज पकड़ में आई तो वे सुनियोजित रणनीति के तहत एक-दूसरे को बख्श देते रहे हैं और अंदर ही अंदर दूसरी पार्टी की मदद करते रहे हैं।</p>
<div style="border-top: 7px solid #5c8a64; border-bottom: 7px solid #5c8a64; margin: 12px; font-weight: bold; font-size: 13pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 115%; padding-top: 7px; text-align: center">कांग्रेस और भाजपा के बीच अंदर ही अंदर जिस तरह के दोस्ताने की खिचड़ी पक रही है, वह असल में नैतिकता की दृष्टि से नापाक और आम देशवासियों के दूरगामी हितों के ख्याल से खतरनाक है।</div>
<p>यूँ तो सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के बीच स्वस्थ और रचनात्मक सहयोग का होना लोकतंत्र की मजबूती और देश के विकास के लिहाज से बहुत अच्छी बात है, लेकिन कांग्रेस और भाजपा के बीच अंदर ही अंदर जिस तरह के दोस्ताने की खिचड़ी पक रही है, वह असल में नैतिकता की दृष्टि से नापाक और आम देशवासियों के दूरगामी हितों के ख्याल से खतरनाक है। यह बात अब छिपी नहीं रह गई है कि ये दोनों पार्टियाँ दरअसल नवसाम्राज्यवादी पूँजीवादी ताकतों के साथ मिलकर उनके लिए एजेंट की भूमिका में ही अपना सुरक्षित भविष्य देख रही हैं। ये पार्टियाँ अपने पूँजीवादी आकाओं के निर्देश पर देश की अस्सी फीसदी आम जनता को लूटने और बीस फीसदी समृद्धिशील जनता को खुश करने वाली नीतियों पर चलना चाहती हैं। ऐसा करते हुए लोकतंत्र के जरिए सत्ता का खेल खेलते हुए पारी-पारी से सत्ता सुख हासिल करते रहने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है। उनकी नीयत और तौर-तरीकों को देखकर गुलामी के दिनों में अंग्रेजपरस्त भारतीय जमींदारों और देशी रियासतों के राजे-महाराजाओं के कारनामे याद आने लगे हैं।</p>
<p>इसी बात को भाँपते हुए राजनीति के धुरंधर एक अरसे से किसी ऐसे तीसरे मोर्चे के मजबूत विकल्प का ताना-बाना बुनने की कवायद शुरू किए जाने की जरूरत शिद्दत से महसूस करते रहे हैं जो कांग्रेस और भाजपा, दोनों पार्टियों से समान दूरी बनाए रखते हुए सैद्धांतिक धरातल पर जनहित के अनुकूल नीतियों को अपनाए और व्यावहारिक धरातल पर बहुमत का समर्थन हासिल कर सकने की काबिलियत रखे।</p>
<p>राजकिशोर जी ने केन्द्र की राजनीति में तीसरे मोर्चे की संभावना की पड़ताल करते हुए सितम्बर, 2007 के अपने लेख <a target="_blank" href="http://raajkishore.blogspot.com/2007/09/blog-post_24.html"><strong>तीसरा मोर्चा उर्फ़&#8230;</strong></a> में कहा था :</p>
<blockquote><p><strong>&#8220;भाजपा कांग्रेस से नहीं डरती। कांग्रेस को हरा कर ही वह सत्ता में आई थी और जिन राज्यों में आई है, इसी रहगुजर से आई है। वह दरअसल तीसरा मोर्चा से डरती है, क्योंकि इस कीटाणु का सच्चा एंटीबॉयटिक वही है। लेकिन वामपंथी पता नहीं किस चीज का इंतजार कर रहे हैं। लंबा इंतजार उन्हें इस लायक नहीं छोड़ेगा कि वे तीसरा मोर्चा का नेतृत्व कर सकें, जैसा कि सिंगूर और नंदीग्राम के कठोर अनुभव बताते हैं।&#8221;</strong></p></blockquote>
<p>यूँ तो समाजवादी पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पिछले दो वर्ष से जब-तब तीसरे मोर्चे के गठन की सुगबुगाहट दिखा रहे थे। लेकिन पिछले वर्ष राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनज़र जब समाजवादी पार्टी, तेलगू देशम पार्टी, अन्नाद्रमुक, इंडियन नेशनल लोकदल, असम गण परिषद जैसी आठ क्षेत्रीय पार्टियों ने मिलकर यूनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिव एलायंस (यूनपीए) नाम से एक तरह के तीसरे मोर्चे का गठन करने की कोशिश की तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने उस वक्त उसे खास तवज्जो नहीं दी। लेकिन अमेरिका के साथ परमाणु संधि के मसले पर यूएनपीए का समर्थन हासिल करने के मकसद से माकपा उसके <a target="_blank" href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/10/071025_left_unpa.shtml">करीब आई</a> और अब वह तीसरे मोर्चे के गठन को लेकर <a target="_blank" href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2008/01/080120_cpm_resolution.shtml">काफी गंभीर</a> है।</p>
<p><strong>भाजपा की घबराहट </strong></p>
<p>तीसरा मोर्चा अभी गर्भ में है और इसमें शक नहीं कि आगामी लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले वह जन्म ले चुका होगा। लेकिन भाजपा अभी से उसके डर से जिस तरह से आतंकित दिख रही है, वह वाकई हैरतअंगेज है। तीसरे मोर्चे को लेकर माकपा एवं अन्य दूसरी पार्टियों की गंभीरता सामने आते ही भाजपा ने जिस तरह की पिनपिनाहट भरी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, उससे उसकी बौखलाहट का साफ पता चलता है। हालाँकि आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उसे तीसरे मोर्चे से अभी इस तरह घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जन्म के बाद अपने राजनीतिक बचपन को पारकर जवानी की दहलीज पर कदम रखने में तीसरे मोर्चे को कुछेक साल तो लग ही जाएंगे। भाजपा को अभी तो अगले आम चुनाव में कांग्रेस और यू.पी.ए. को परास्त करने में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए। बहरहाल, तीसरे मोर्चे के जन्म के संबंध में <a target="_blank" href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_4105255/">भाजपा के प्रवक्ता ने जो कुछ कहा है</a>, उस पर गौर फरमाना एक बार जरूरी है :</p>
<blockquote><p><strong>&#8220;भारतीय राजनीति अब द्विध्रुवीय हो गई है और भाजपा तथा कांग्रेस भारतीय राजनीति के दो ध्रुव हैं। तीसरे मोर्चे के गठन की बात करना भारतीय जनमत को तोड़ने मरोड़ने की कोशिश है। &#8230; तथाकथित तीसरे मोर्चे का शोशा कुछ और नहीं बल्कि भाजपा के उत्थान में बाधा डालने तथा उसे सत्ता में आने से रोकने का प्रयास है।&#8230; तीसरे मोर्चे के निर्माण की बात करना माकपा की धृष्टता और उसके अतिनिम्न स्तरीय अहंकार को दर्शाता है।&#8221;</strong></p></blockquote>
<div style="border-top: 7px solid #5c8a64; border-bottom: 7px solid #5c8a64; margin: 11px; font-weight: bold; font-size: 13pt; float: left; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 115%; padding-top: 7px; text-align: right">यदि तीसरे मोर्चे को सही मायने में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का मजबूत विकल्प बनकर उभरना है और दोनों को एक साथ जोरदार टक्कर दे सकने की कुव्वत पैदा करनी है तो उसमें वामपंथी पार्टियों के साथ-साथ बहुजन समाज पार्टी को भी अनिवार्य रूप से शामिल होना पड़ेगा।</div>
<p>यदि तीसरे मोर्चे को सही मायने में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का मजबूत विकल्प बनकर उभरना है और दोनों को एक साथ जोरदार टक्कर दे सकने की कुव्वत पैदा करनी है तो उसमें वामपंथी पार्टियों के साथ-साथ बहुजन समाज पार्टी को भी अनिवार्य रूप से शामिल होना पड़ेगा। बसपा का भी मालूम है कि कांग्रेस और भाजपा उसके सच्चे हमराही कभी नहीं बन सकते और केन्द्र की सत्ता में काबिज होने का उसका अवसरवादी एजेंडा उनके साथ दोस्ती करके पूरा नहीं होगा, इसलिए देर-सबेर वह भी तीसरे मोर्चे के करीब आएगी। भले ही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से उसकी कट्टर दुश्मनी जारी रहे, पर केन्द्र की राजनीति में वह उसी तीसरे मोर्चे का एक ताकतवर घटक बनकर रहना चाहेगी, जिसमें समाजवादी पार्टी भी शामिल होगी।</p>
<p><strong>नेतृत्व की पेचीदगी</strong></p>
<div style="border-top: 7px solid #5c8a64; border-bottom: 7px solid #5c8a64; margin: 11px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 115%; padding-top: 7px; text-align: center">जिस दिन उसे कोई ऐसा सर्वमान्य नेतृत्व मिल जाएगा, तीसरा मोर्चा अपनी राजनीतिक जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका होगा और फिर उसकी राह रोक सकने की जुर्रत कांग्रेस और भाजपा में नहीं हो सकेगी।</div>
<p>तीसरे मोर्चे के लिए सबसे मुश्किल गुत्थी उसमें किसी सर्वमान्य नेतृत्व की तलाश से जुड़ी है। बहुत मुश्किल होगा इस मोर्चे में शामिल हर घटक राजनीतिक दल के लिए कि वह अपनी स्वतंत्र पहचान और अपने नेता की महत्वाकांक्षा को परे रखते हुए किसी ऐसे नेता को स्वीकार कर ले, जिसकी छवि और क्षमता सर्वमान्य हो, असंदिग्ध हो। जिस दिन उसे कोई ऐसा सर्वमान्य नेतृत्व मिल जाएगा, तीसरा मोर्चा अपनी राजनीतिक जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका होगा और फिर उसकी राह रोक सकने की जुर्रत कांग्रेस और भाजपा में नहीं हो सकेगी।</p>
<p><strong>मोर्चे का थिंक टैंक</strong></p>
<p>यह मानने में कोई हिचक नहीं कि सत्ता हथियाने का अवसरवाद ही तीसरे मोर्चे के गठन का मुख्य उत्प्रेरक अब भी है। कोई पावन सैद्धांतिक निष्ठा, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता, जनहित और राष्ट्रहित की उदात्त प्रेरणा इसके पीछे नहीं है। लेकिन कालचक्र घूमते-घूमते अब उस दौर में पहुँच चुका है, जब इस तीसरे मोर्चे को भारत की राजनीति में एक निमित्त बनकर महापरिवर्तन के वाहक का दायित्व पूरा करना है। तीसरे मोर्चे को वह धुरी बननी है जिसके सहारे महाकाल अपनी अभूतपूर्व विराट योजनाओं को अंजाम दे सके। यदि तीसरा मोर्चा अपनी इस चुनौतीपूर्ण भूमिका को स्वीकार करता है तो उसे राजनीति, अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, विज्ञान और टेक्नोलॉजी तथा सामरिक नीति के विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र थिंक टैंक बनाकर मुद्दे, कार्यक्रम और नीतियों से जुड़े मसलों को तय करने और उन्हें कारगर रूप से पेश करने का दायित्व सौंप देना चाहिए।</p>
<p><strong>भविष्य के समर्थ नेता</strong></p>
<p>हमारे देश में सरोकार, समझ और संभावना से भरपूर कई ऐसे संगठन और राजनीतिक व्यक्तित्व गढ़े जाने की प्रक्रिया में हैं जो निकट भविष्य में तीसरे मोर्चे का नेतृत्व संभाल सकते हैं। आज भले ही वे नेपथ्य में छिपे दिखाई देते हों, लेकिन आने वाले समय में जब कालचक्र की मथनी घूमेगी तो मौजूदा दौर के ज्यादातर धुरंधर और दबंग राजनेता उड़कर हाशिये पर जा फिकेंगे और तब इन होनहार राजनेताओं को राजनीति की मुख्यधारा में जगह बनाने का मौका मिलेगा। <a target="_blank" href="http://www.loksatta.org">लोक सत्ता पार्टी </a>के डॉ. जयप्रकाश नारायण, एकता परिषद के <a target="_blank" href="http://en.wikipedia.org/wiki/P_V_Rajagopal">पी.वी. राजगोपाल</a>, <a target="_blank" href="http://www.ijp.co.in">इंडियन जस्टिस पार्टी</a> के उदित राज, <a target="_blank" href="http://www.proxsa.org/politics/napm.html">नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट</a> की मेधा पाटेकर, आदि के अलावा स्वामी अग्निवेश, राजकिशोर, वेद प्रताप वैदिक, आदि जैसे कई प्रबुद्ध, प्रतिबद्ध एवं प्रखर व्यक्ति आने वाले दौर में स्वस्थ और बेहतर राजनीति का माहौल तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आगे आ सकते हैं।</p>
<p><strong>राजनीति के संबंध में पिछले कुछ लेख :</strong></p>
<ul>
<li><a target="_blank" href="http://srijanshilpi.com/?p=36">कब तक चलेगा गठबंधन की राजनीति का दौर?</a></li>
<li><a target="_blank" href="http://srijanshilpi.com/?p=150">समय की डायरी में दर्ज हैं तटस्थों के अपराध</a></li>
<li><a target="_blank" href="http://srijanshilpi.com/?p=134">लोकतंत्र नहीं है अभी भारत में</a></li>
<li><a target="_blank" href="http://srijanshilpi.com/?p=126">मायावती की जीत के निहितार्थ और भावी राजनीति</a></li>
</ul>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=156</wfw:commentRss>
		<slash:comments>7</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सर्च इंजन के जरिए चिट्ठों पर आने वाले पाठक</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/?p=155</link>
		<comments>http://srijanshilpi.com/?p=155#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 09 Jan 2008 03:58:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[चिट्ठाकारिता]]></category>
		<category><![CDATA[भाषा चिंतन]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://srijanshilpi.com/?p=155</guid>
		<description><![CDATA[यह देखकर अच्छा लग रहा है कि हिन्दी साहित्य के शोधछात्र भी अब शोध के
सिलसिले में इंटरनेट का रुख़ करने लगे हैं और गूगल सर्च एवं हिन्दी विकिपीडिया के लेखों में दिए गए संदर्भ लिंकों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठों पर उपलब्ध सामग्रियों में से भी अपने उपयोग लायक सामग्री तलाश रहे हैं। इस तरह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img align="right" src="http://farm3.static.flickr.com/2411/2179019065_c23aa9bbce_o.jpg" />यह देखकर अच्छा लग रहा है कि हिन्दी साहित्य के शोधछात्र भी अब शोध के<br />
सिलसिले में इंटरनेट का रुख़ करने लगे हैं और गूगल सर्च एवं हिन्दी विकिपीडिया के लेखों में दिए गए संदर्भ लिंकों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठों पर उपलब्ध सामग्रियों में से भी अपने उपयोग लायक सामग्री तलाश रहे हैं। इस तरह के शोध छात्रों का मेरे चिट्ठे पर भी समय-समय पर आकस्मिक आगमन होता रहता है और उनमें से कुछ छात्र यहां से कोई सामग्री लेते समय टिप्पणी करके इसकी सूचना देने के साथ-साथ धन्यवाद देना भी नहीं भूलते। हालांकि यह उम्मीद तो उनसे नहीं रखी जा सकती कि अपने शोधपत्र में भी वे इन चिट्ठों का संदर्भ देने की ईमानदारी बरतते होंगे, फिर भी अपने-आप में यही सुखद संतोष की बात है कि उन लेखों को लिखने के दौरान हुई मेहनत लंबे अरसे तक सुपात्रों के काम आती रहने वाली है।</p>
<p><strong>जो तोड़ेंगे चिट्ठाकारी के संकीर्ण दायरे को<br />
</strong></p>
<p>हालांकि चिट्ठाकारी की अपनी जो खास प्रकृति है वह ब्लॉग पर लिखी जाने वाली प्रविष्टियों में एक किस्म की व्यक्तिपरकता, अनौपचारिकता और तात्कालिकता को जरूरी बना देती है, इसलिए ज्यादातर चिट्ठाकार उसी अंदाज में रोजाना के नियमित पाठकों के लिए लिखने हेतु प्रेरित होते हैं और ब्लॉग एग्रीगेटर एवं फीड रीडर के माध्यम से अपने नियमित पाठकों तक पहुँचकर उनकी टिप्पणियों के बैरोमीटर से अपने लेखन की लोकप्रियता की पैमाइश करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे हिन्दी में भी सर्च इंजन के माध्यम से कंटेंट तक पहुंचने वाले पाठकों की संख्या बढ़ रही है। ये पाठक कुछ अलग किस्म के हैं, जो चिट्ठाकारी से अपरिचित हैं, जो हिन्दी टाइप करना भी नहीं जानते, लेकिन वे किसी खास विषय पर प्रासंगिक और उपयोगी सामग्री की तलाश में भटकते हुए यहाँ आते हैं। <img align="right" src="http://farm3.static.flickr.com/2087/2179019061_35558ea1e5_o.jpg" />दरअसल वे ही सही मायने में असली पाठक हैं, क्योंकि उन्हें कुछ जानने की प्यास लगी है और वे उसकी तलाश में खुद चलकर आए हैं। वे आपको नहीं जानते, और न ही आप उनको जानते हैं। जब किसी वेबसाइट या ब्लॉग पर आकर उन्हें कोई ऐसी उपयोगी सामग्री मिलती है जो अन्यत्र उन्हें सुगमता से उपलब्ध नहीं हो पा रही थी, तो इससे हमारी वेबसाइट या ब्लॉग के अस्तित्व का प्रयोजन भी सार्थक होता है। वे जब हमारे लेखन पर कोई टिप्पणी करते हैं या आपके लेखन से उनको हुए लाभ के लिए आभार व्यक्त करते हैं तो वह पूरी तरह से उनकी अहैतुकी प्रतिक्रिया होती है। पहले से परिचित मित्रों या चिट्ठाकारों द्वारा आपस में एक-दूसरे का लिखा पढ़ने, उन पर चर्चा करने और टिप्पणी करने का मौजूदा संकीर्ण दायरा इसी तरह के पाठक तोड़ेंगे और चिट्ठाकारी को एक अलग तरह की सार्थकता प्रदान करेंगे।</p>
<p><strong>विकिपीडिया में चिट्ठों का योगदान</strong></p>
<p>जब हम इंटरनेट पर अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी की समृद्धि के संदर्भ में सोचते हैं तो हमें यह अहसास होता है कि अलग-अलग विषयों पर हिन्दी में गुणवत्तापरक सामग्री का इंटरनेट पर उपलब्ध होना कितना जरूरी है। इस दृष्टि से हिन्दी विकिपीडिया की परियोजना से अधिकाधिक लोगों के स्वैच्छिक रूप से जुड़ने के संबंध में अक्सर चर्चा होती रही है। हमारे हिन्दी चिट्ठाकारों में से कुछेक साथी विकिपीडिया को समृद्ध करने की दिशा में सक्रिय योगदान कर भी रहे हैं। लेकिन जुलाई, 2003 में शुरु हुई हिन्दी विकिपीडिया में अब तक आधे-अधूरे केवल साढ़े पंद्रह हजार लेख ही संग्रहित हो पाए हैं। अंग्रेजी विकिपीडिया पर उपलब्ध 21.6 लाख लेखों की तुलना में हिन्दी विकिपीडिया कहीं नहीं ठहरता। यदि हम अपने चिट्ठों पर कभी-कभार अलग-अलग विषयों पर मौलिक एवं अनूदित सूचनात्मक, तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक लेखों को भी प्रकाशित किया करें तो उनके आधार पर विकिपीडिया जैसी परियोजना के माध्यम से इंटरनेट पर हिन्दी को समृद्ध करने में काफी योगदान हो सकेगा। पिछले दिनों <a target="_blank" href="http://pratibhaas.blogspot.com">अनुनाद जी</a> से इस संबंध में बात हो रही थी, जो हिन्दी विकिपीडिया की समृद्धि में निरंतर लगे रहते हैं तो उनका यह अनुभव था कि हिन्दी चिट्ठों पर ऐसी सामग्री अत्यंत विरल ही प्रकाशित होती है जिनका संदर्भ लेकर विकिपीडिया के लेखों को समृद्ध किया जा सके।</p>
<p>मैंने इस चिट्ठे पर कबीर, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, निर्मल वर्मा, हरिशंकर परसाई, आदि रचनाकारों पर केन्द्रित कुछ आलोचनात्मक लेखों के अलावा समय-समय पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर भी शोधपूर्ण लेखन करने का प्रयास किया है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की रहस्यमय गुमशुदगी के संबंध में शोधपरक लेख-श्रृंखला भी उसी प्रयास का एक अंग थी। इस तरह का लेखन आगे भी जारी रखने का प्रयास रहेगा।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://srijanshilpi.com/?feed=rss2&amp;p=155</wfw:commentRss>
		<slash:comments>10</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>
