जड़ प्रकृति के पिंडों के बीच जिस प्रकार आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल सर्वदा एक साथ क्रियाशील रहते हैं जिनके कारण उनके बीच एक संतुलन बना रहता है, ठीक वैसे ही आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल चेतन प्रकृति के जीवों के बीच भी सदा क्रियाशील रहते हैं जो सृष्टि चक्र में संतुलन बनाए [...]
यह देखकर अच्छा लग रहा है कि हिन्दी साहित्य के शोधछात्र भी अब शोध के
सिलसिले में इंटरनेट का रुख़ करने लगे हैं और गूगल सर्च एवं हिन्दी विकिपीडिया के लेखों में दिए गए संदर्भ लिंकों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठों पर उपलब्ध सामग्रियों में से भी अपने उपयोग लायक सामग्री तलाश रहे हैं। इस तरह [...]
Posted in चिट्ठाकारिता, भाषा चिंतन on January 6th, 2008 9 Comments »
इंटरनेट : मानवता का व्यक्त मानस पटल
इंटरनेट, समकालीन अग्रगामी मानवता का समष्टिगत, व्यक्त मानस पटल है। मानव अभिव्यक्ति का यह एक ऐसा विराट, अनंत और जीवंत सागर है जिसमें विचारों, भावनाओं और सूचनाओं की निरंतर चतुर्दिक तरंगें और लहरें उठती रहती हैं। प्रकृति ने मनुष्य को अभिव्यक्ति की जो बेचैनी और क्षमता नैसर्गिक रूप से [...]