Posted in कविता on December 8th, 2007 3 Comments »
हर रोज
टीवी, इंटरनेट और अख़बार
ठेल देते हैं मेरे भीतर
संसार के खारे समंदर की
ढेर सारी बेतहाशा हलचल।
एक दरिया मेरे अंदर से भी
उमड़ता है रोज संसार की तरफ
लबरेज
बेबसी और बेचैनी की बुदबुदाहटों भरा
गंदला बेस्वाद जल।
हर रोज
कुछ थपेड़े संसार के समंदर के
करते हैं आघात मेरे पथरीले वजूद पर
तोड़ देते हैं हर उस नाजुक हिस्से को
जो [...]
Posted in कविता, साहित्य on November 13th, 2007 10 Comments »
कब से सुन रहा हूँ सुदूर से आती हुई
तुम्हारे पदचापों की मधुर ध्वनि
आ रहे हो तुम
धीरे-धीरे हमारे बीच
तुम्हारे आने की ख़बर
हमें सदियों से है
हम हर घड़ी तुम्हारे ही इंतजार में रहे हैं।
पहुँच चुके हैं धरा पर
तुम्हारे पगों के स्पंदन
आ तो चुके हो मगर छुपे हो
आम लोगों की ओट में
न हो तुम कोई राजकुमार
और न ही [...]
Posted in कविता, साहित्य on May 3rd, 2007 7 Comments »
मार्च में जब मैंने अपनी कविता मुझे विदुर चाहिए पोस्ट की थी तब मुझे कतई अंदाज़ा नहीं रहा था कि उस पर इतनी व्यापक और तीव्र प्रतिक्रिया होगी। उक्त कविता में भीष्म पर किए गए प्रहारों ने कई संवेदनशील पाठकों को विचलित किया और उसके परिणामस्वरूप मेरे और पाठकों के बीच टिप्पणियों-प्रतिटिप्पणियों का एक लंबा दौर भी चला। [...]