यह देखकर अच्छा लग रहा है कि हिन्दी साहित्य के शोधछात्र भी अब शोध के
सिलसिले में इंटरनेट का रुख़ करने लगे हैं और गूगल सर्च एवं हिन्दी विकिपीडिया के लेखों में दिए गए संदर्भ लिंकों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठों पर उपलब्ध सामग्रियों में से भी अपने उपयोग लायक सामग्री तलाश रहे हैं। इस तरह [...]
Posted in चिट्ठाकारिता, भाषा चिंतन on January 6th, 2008 9 Comments »
इंटरनेट : मानवता का व्यक्त मानस पटल
इंटरनेट, समकालीन अग्रगामी मानवता का समष्टिगत, व्यक्त मानस पटल है। मानव अभिव्यक्ति का यह एक ऐसा विराट, अनंत और जीवंत सागर है जिसमें विचारों, भावनाओं और सूचनाओं की निरंतर चतुर्दिक तरंगें और लहरें उठती रहती हैं। प्रकृति ने मनुष्य को अभिव्यक्ति की जो बेचैनी और क्षमता नैसर्गिक रूप से [...]
Posted in भाषा चिंतन, समसामयिक on July 15th, 2007 10 Comments »
राजभाषा हिन्दी भारत में घर की मुर्गी की तरह है जो दाल बराबर समझी जाती रही है, लेकिन न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कराने की बहुत धूमधाम से कवायद चल रही है। विडंबना की बात यह है कि हिन्दी के दिग्गज विद्वान इस समय चल रहे विश्व [...]