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स्कूल के दिनों में समूह प्रार्थना करते समय हमारे कुछ मुसलमान सहपाठी पंक्ति में शामिल तो होते थे, पर मौन रहते थे और उनके हाथों की मुद्रा भी विश्राम में रहती थी। यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष शब्दावली वाली प्रार्थनाओं या राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के समय भी उनका अंदाज वही रहता था। एक बार टोका तो उनमें से एक ने बताया कि वे ऐसा अपनी धार्मिक मान्यतायों के कारण करते हैं। लेकिन इस बात को लेकर हमारे यहां कोई मुद्दा बना हो, ऐसा याद नहीं आता।

जब कॉलेज में थे तो एक बार पढ़ने में आया कि केरल के एक स्कूल से एक खास समुदाय के कुछ बच्चों को इसलिए निकाल दिया गया था वे राष्ट्रगान के समय सबके साथ खड़े तो रहते थे, मगर उसे गाते नहीं थे। वह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा था और अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि

यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र-गान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है।

लेकिन, उसके बाद भी जब कभी स्कूलों में वन्दे मातरम् के गायन को अनिवार्य किए जाने के प्रयास हुए तो उस पर उठे हंगामे को शांत करने के लिए समाधान यही सुझाया गया कि इसे थोपा नहीं जाना चाहिए कि हर कोई इसे गाये ही, लेकिन उसका सम्मान वह जरूर करे।

हाल ही में मध्य प्रदेश के स्कूलों में बच्चों के लिए सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और अब, गीता की शिक्षा को अनिवार्य किए जाने पर भी ऐसा ही विवाद देखने को मिला।

जंतर-मंतर पर अन्ना के अनशन के दौरान बनाए गए मंच की पृष्ठभूमि में भारत माता की मौजूदगी को लेकर भी इतने सवाल उठाए गए कि रामलीला मैदान में अनशन के दौरान आयोजकों को यह जरूरी लगा कि मंच की पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी का चित्र लगाकर धर्मनिरपेक्षता का परिचय दिया जाए।

जंतर-मंतर पर अण्णा हजारे

रामलीला मैदान में अण्णा हजारे

धर्मनिरपेक्षता बरतने की इतनी कोशिश के बाद भी अण्णा द्वारा ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगवाए जाने पर जामा मस्जिद के इमाम के नाराज होने और टीम अन्ना द्वारा इमाम को मनाए जाने की कोशिश के वाकये पर लखनऊ के एक शायर काज़िम जरवली ने कुछ यूँ अर्ज़ किया:

बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बा मे बोलिये,
फर्क मतलब पर नहीं पड़ता है ख़ालिक़ कि क़सम ।
“माँ के पैरो मे है जन्नत” क़ौल है मासूम का,
मै मुसल्ले पर भी कह सकता हुं “वन्दे मातरम” ।।

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने एक खत भी लिखा:

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ने फ़रमाया है कि “जन्नत माँ के पैरों के नीचे है” अर्थात् माँ वन्दनीय है। यह एक साफ़ मुस्लिम दृष्टिकोण है। किसी आन्दोलन में भाग लेना या विरोध करना एक निजी फैसला हो सकता है, लेकिन धर्म के नाम पर इसका विरोध निन्दनीय है; और वन्दे मातरम कहने में इस्लामिक दृष्टिकोण से कोई बुराई नहीं है।

वन्दे मातरम का मतलब है कि हे माँ, आप पूज्य हैं और वास्तव में माँ पूज्य है। माँ को पूजनीय कहने में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह केवल शब्दों का हेरफेर भर है, वरना किस मुसलमान के लिए माँ पूजनीय नहीं है, अर्थात् सब पूजनीय मानते हैं।

केवल इस वजह से माँ को पूज्य मानने से इनकार करना कि ये शब्द (वन्दे मातरम) हिंदी में कहे गए हैं, इसे केवल एक संकीर्ण मानसिकता ही कहा जा सकता है। वे इसे मुसल्ले (नमाज़ पढ़ने का पवित्र कपड़ा) पर भी कह सकते हैं, क्योंकि माँ को पूज्य होने का दर्जा उसी पैग़म्बर ने दिया है जिसने नमाज़ पढने को कहा है। यह कहाँ का तर्क है कि एक कहा माने और एक कहा न माने।

माँ को पूज्य मानने या कहने का मतलब यह कदापि नहीं कि उसको भगवान मान लिया है; और वो हमारे कहते ही अब ईश्वर हो गयी; और ये दो ईश्वरवाद का सिद्धांत हो गया। हे संकीर्ण मानसिकता वालों, माँ को भगवान् हिन्दू भी नहीं मानते, बल्कि कोई धर्म माँ को ईश्वर नहीं मानता। हिन्दू धर्म में मातृभूमि को माँ का दर्जा दिया जाता है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। देश से प्यार करना एक गर्व की बात है। कोई नास्तिक भी इसका विरोध नहीं कर सकता। भगवान के मानने वालों की तो बात ही अलग है। यहाँ पर यह विदित रहे, इसलिए मुस्लिम इतिहास का हवाला दिया जा रहा कि पैग़म्बर मुहम्मद ने अपने जीवन में सिर्फ एक बार आक्रमण किया। यह आक्रमण मक्का, जो उनकी मातृभूमि थी, उसमें रहने का हक़ पाने के लिए किया गया था। इस्लाम में भी देशप्रेम की भावना को उचित और ज़रूरी बताया गया है।

यहाँ पर प्रकट विचारों का अभिप्राय किसी धर्म-विशेष को अच्छा-बुरा बताना या किसी आन्दोलन को सही या गलत क़रार देना नहीं है। बल्कि धर्म के नाम पर नफरत व द्वेष का वातावरण न पैदा होने देना है। यदि कोई इन निजी विचारों से सहमत नहीं है तो वह इसके लिए बाध्य भी नहीं है। हमारा विनम्र निवेदन यही होगा कि न बुखारी को माने, न तोगड़िया के उग्र भाषणों से प्रेरित हों, बल्कि अपने अन्दर बैठे विकेक का प्रयोग करे, तब सही या गलत का निर्णय ले ।

लखनऊ के निकट जरवल में 1955 में जन्मे क़ाजिम जरवली फिलहाल लखनऊ के शिया कॉलेज में कार्यरत हैं और देश-विदेश में आयोजित होने वाले मुशायरों में भाग लेते रहते हैं और कई पुरस्कारों से भी वह नवाजे जा चुके हैं। उनकी रचनाओं के कुछ संकलन भी प्रकाशित हुए हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी रचनाओं को अपने ब्लॉग पर भी डालना शुरू किया है और कविता कोश पर भी वे रचनाएं उपलब्ध हैं।  

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‘मौन, शून्य और शांति’ सत्य के प्राय: सभी साधकों के लिए अभिव्यक्ति के न सिर्फ प्रस्थान-बिंदु, बल्कि चरम गंतव्य भी रहे हैं। यह और बात है कि अभिव्यक्ति के लिए वे भले ही अलग-अलग माध्यम चुनते हों।

अक्षय अमेरिया  हमारे दौर के एक ऐसे ही युवा चित्रकार हैं, जिनके चित्रों में मौन के महाशून्य से निकले शांति के स्वर गूंजते हैं। जैसा कि हर सच्चा कलाकार होता है, अक्षय के चित्र उनके भीतर के स्वप्न-द्रष्टा की झलक दिखाते हैं।

1963 में इंदौर में जन्मे और उज्जैन में रहने वाले अक्षय अमेरिया ने एम. एस. विश्वविद्यालय, बड़ौदा से चित्रकला में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है और वह अचल एलायस अवार्ड, अभ्युदय सम्मान, मीरा कला सम्मान, विष्णु चिंचालकर कला सृजन सम्मान आदि जैसे कई सम्मानों से अलंकृत हो चुके हैं।

मैंने पहले गौर नहीं किया था, पर अब ध्यान में आया है कि इस ब्लॉग पर भी उनका यदा-कदा आना-जाना रहा है। यहां तक कि उनके भेजे कई चित्र मेरे ई-मेल के इनबॉक्स में भी पाए गए हैं, जो असावधानी के चलते मेरी निगाहों से अब तक ओझल ही थे।

कहते हैं कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर अभिव्यक्ति करने में सक्षम होता है। मगर जब वह चित्र मौन को अभिव्यक्त करे तो …? उसके बराबर अभिव्यक्ति की क्षमता कितने शब्दों में होगी? अपनी कुछ पोस्टों में मैंने मौन को समझने और अभिव्यक्त करने के प्रयास किए हैं। लेकिन यदि आप अक्षय के इन चित्रों को देखें तो पता चलेगा कि शब्दों के बनिस्पत चित्र उसे कितने बेहतर अभिव्यक्त कर सकते हैं:

 

 

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आशा है कि न्यासिता (ट्रस्टीशिप) के बारे में गांधीजी के सिद्धांतों और ओमप्रकाश कश्यप द्वारा उन सिद्धांतों में इंगित की गई ‘कमजोरियों’ से अब तक आप अवगत हो चुके हैं। दरअसल, कश्यप जी द्वारा की गई आलोचना को गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांतों की एक प्रतिनिधि आलोचना माना जा सकता है और अपने लेख में उन्होंने प्राय: वे सारी आपत्तियां व्यक्त कर दी हैं जो कि आम तौर पर इस सिद्धांत के संदर्भ में की जाती रही हैं।

कश्यप जी ने मोटे तौर पर गांधीजी के सिद्धांतों में पांच प्रमुख कमजोरियों को रेखांकित किया है:

1. इस सिद्धांत का दुरुपयोग पूंजीपति ट्रस्ट की आड़ में अनैतिक तरीकों से अर्जित किए गए धन को वैध बनाने में कर सकते हैं।

2. यह उसी दान-परंपरा का आधुनिक रूप है जिसे सामंती व्यवस्था के तहत धर्म का एक अंग माना जाता रहा है।

3. इस सिद्धांत में बहुसंख्यक आम जनता को विवेकहीन मानते हुए उनके हित के बारे में फैसला लेने का अनुचित अधिकार थोड़े-से पूंजीपतियों को दे दिया गया है।

4. इस सिद्धांत से हमारी व्यवस्था में मौजूद आर्थिक-सामाजिक विषमता का कोई स्थायी समाधान नहीं मिलता है।

5. यह उस श्रमिकसंघवाद का विरोधी विचार है जो श्रमिकों के संगठित संघर्ष द्वारा उत्पादन तंत्र पर अधिकार हासिल करके बेरोजगारी और आर्थिक विषमता को दूर करने का एक अधिक प्रगतिशील वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है।

अब मैं न्यासिता संबंधी अपने उस व्यावहारिक मॉडल की अवधारणा आपके समक्ष रखने जा रहा हूँ, जिसका प्रस्ताव मैंने इससे संबंधित पिछली पोस्टों में किया था।

इसे समझकर आप ही बताएं कि क्या यह गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप है और क्या इससे उन उपर्युक्त आलोचनाओं का निराकरण हो जाता है, जिसके कारण ट्रस्टीशिप संबंधी उनके सिद्धांतों को कभी अमल में लाने लायक नहीं समझा गया?

अपने स्तर पर मैंने संबंधित क़ानूनी प्रावधानों को भी देख लिया है और मेरे हिसाब से यह उनके दायरे में है।

  • न्यासी कोई भी बन सकता है, जरूरी नहीं कि वह कोई पूंजीपति हो।
  • इसका संबंध व्यक्ति की उस नैतिकता से है, जो सबके भले में अपना भला भी देखता है, न कि किसी तथाकथित धर्म से। (हाँ, यदि आप धर्म को उस नज़रिये से देख सकें, जिससे मैं देखता हूं तो आप न्यासिता को धर्म से जोड़ सकते हैं।)
  • ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसके पास नैतिक उपायों से धन अर्जित करने, उस पर नियमानुसार कर आदि चुकाने, और जीवनोपयोग में होने वाले औसत स्तर के आवश्यक खर्च के बाद भी कुछ बचत हो जाती है तो यदि वह चाहे तो न्यासिता को अपना सकता है।
  • ऐसा व्यक्ति अपनी अधिकतम क्षमता के अनुरूप धनार्जन करे, मगर खर्च केवल औसत आवश्यकता के अनुरूप ही करे। जो बचत हो उसका एक अंश नियमित रूप से समाज के हित के लिए अपने ही पास अलग से रखे।
  • उसे करना क्या है? उसे केवल संकल्पपूर्वक यह सार्वजनिक घोषणा करनी है कि उसने अपनी बचत में से इतनी राशि समाज के हित के लिए अपने पास रखी है।
  • इस तरह हर एक व्यक्ति के पास अलग से संकल्पपूर्वक रखे गए धन के अंशों को मिलाकर जो वर्चुअल निधि बनेगी वह किसी एक खाते में जमा नहीं रहेगी और न ही किसी एक खाते से हस्तांतरित होगी।
  • आप पूछेंगे कि इसमें भला न्यासिता कहां से आ गई? इस तरह से सृजित हुई वर्चुअल निधि की न्यासिता इस बात से निर्धारित होगी कि उसका सदुपयोग व्यक्तियों की अपनी मर्जी से न होकर सामूहिक विवेक से तय होगा। इस तरह के सामूहिक विवेक को मैं ‘प्रज्ञा’ नाम देता हूं।
  • जरूरी नहीं कि इस तरह की वर्चुअल निधि केवल धन की हो। इस तरह की virtual pooling के तहत बनाया गया न्यास समय, श्रम और बुद्धि जैसे ऐसे संसाधनों का भी हो सकता है, जिनकी बचत संभव नहीं।

जाहिर है कि अभी यह एक अवधारणा मात्र है और इस विषय पर मैं ऐसे सभी व्यक्तियों से संवाद करने को तत्पर हूं जो इसके महत्व को किसी हद तक समझ सकते हैं।

लेकिन मेरा इरादा इसे व्यवहार में आजमाने का भी है और इस ब्लॉग पर इस उद्देश्य से मैं एक स्थायी पृष्ठ अलग से बनाने जा रहा हूं, जो इस तरह के न्यास का एक व्यावहारिक मूर्त्त मॉडल सामने रखेगी। यदि आप इस अवधारणा के मूलभूत तत्वों से सहमत हो पाते हैं तो इस न्यास में आपका स्वागत है। यदि आपके मन में इससे जुड़ा कोई भी सवाल उठता है तो आप बेहिचक यहां टिप्पणी के तौर पर उसे दर्ज कर सकते हैं।

जैसा कि गांधीजी ने स्वयं कहा था कि

इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं है कि इस अवधारणा के अनुसार कितने लोग सच्चे न्यासी के रूप में आचरण कर सकते हैं। अगर यह  सिद्धांत सही है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस पर अनेक लोग चल रहे हैं या केवल एक ही आदमी चल रहा है। प्रश्न केवल दृढ़ आस्था का है।

न्यासिता दरअसल नि:स्वार्थता का ही एक व्यापक रूप है। जब अर्जित ‘अर्थ’ के प्रति ‘स्व’ के भाव का लोप हो जाता है और व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से उस अर्थ को परमार्थ के प्रति समर्पित कर देता है तो यह प्रक्रिया न्यासिता बन जाती है।

नि:स्वार्थता के अलावा यह विवेकशील व्यक्तियों का कर्तव्य भी है, जैसा कि कबीर कह गए हैं:

जो जल बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़ै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।

सनातन परंपरा में इसे सृष्टि का पहला नियम माना जाता है कि देने से घटता नहीं है। ऐसा माना जाता है कि परमार्थ की दृष्टि से सुपात्र को किया गया अंशदान उपयुक्त समय पर उसी तरह वापस लौट आता है, जैसे सतत प्रवाहित नदी में जल की आपूर्ति अनवरत कायम रहती है।

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इस वर्ष अप्रैल में जंतर-मंतर पर हुए अन्ना के असरकारी अनशन के बाद मैंने आशंका जाहिर की थी कि आंदोलन की सफलता का श्रेय और लाइमलाइट लूटने की पुरानी होड़ और व्यक्तित्वों की आपसी टकराहट उसे राह से भटका न दे। वह आशंका सच साबित होने लगी है। और अब तो हालत यह हो चली है कि टीम अन्ना के भीतर से ही कोर कमेटी को भंग कर दिए जाने की मांग प्रबल होने लगी है और अण्णा हैं कि मौन के अपने विस्तारित व्रत में यह समाधान तलाश लाए हैं कि कोर टीम का विस्तार कर देना ही बेहतर उपाय है।

यह तो शुरू से ही स्पष्ट था कि सत्ता हर संभव कोशिश करेगी कि इस आंदोलन को या तो कुचल दिया जाए या उसके नेतृत्वकर्ताओं को बदनाम कर दिया जाए और उनके बीच आपस में फूट डाल दी जाए। लेकिन यदि टीम अन्ना ने अपने भीतर की कमजोरियों को दूर करने का ठीक से प्रयास किया होता और आपस में समन्वय एवं संतुलन का कोई तरीका निकाला होता तो सत्ता अपने हथकंडों में कभी कामयाब नहीं हो सकती थी।

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