मनुष्य, रोबोट और क्लोन

इस ब्लॉग पर वर्तमान शृंखला लिखते समय मैं स्वत:स्फूर्त अंदाज में हूं। इस बार लिखते समय पहले की भाँति कोई तैयारी नहीं कर रहा। कोई संदर्भ नहीं देख रहा, कोई उद्धरण नहीं दे रहा। दरअसल मेरे सामने कोई विषय नहीं है इस वक्त। संसार का कोई प्रश्न, कोई समस्या है ही नहीं मेरे सामने।  ऐसा लगता है कि समस्याओं को मुझसे कोई मतलब नहीं रह गया है। फिर भी, मुझे कुछ लिखना है, लिखने का रियाज करते रहना है। जैसे कि कोई संगीतकार अपना दैनिक रियाज करता है, आलाप लेता रहता है। उसका कोई खास मतलब नहीं होता। वह किसी श्रोता को ध्यान में रखकर ऐसा नहीं कर रहा होता। तो उसी तरह, वर्तमान शृंखला की पोस्टों को आप दैनिक रियाज की तरह ही लीजिए। और मैं समझ भी रहा हूँ कि आप उसे इसी रूप में ही ले रहे हैं। अन्यथा कोई प्रतिक्रिया तो आती।

वैसे भी, इन दिनों लोगों के भीतर अभिव्यक्ति की तीव्र लहरें उठ रही हैं और लोग हर उपलब्ध माध्यम पर खुद को व्यक्त करने में लगे हुए हैं। कोई श्रोता नहीं है, कोई पाठक नहीं है, कोई दर्शक नहीं है। तो यह अच्छा है। मैं भी यही सोच रहा हूँ कि मैं किसी पाठक के लिए नहीं लिख रहा। बस, लिख रहा हूँ। क्योंकि, यही एकमात्र ऐसा कर्म है, जो मेरा स्वाभाविक कर्म है। रोजगार के लिए भी लिखना ही होता है। तो, स्वत:स्फूर्त ढंग से यह लिखना हो रहा है। जैसे, कोई चिड़िया चहचहाती है, जैसे कोई नदी बहती है, जैसे कोई फूल खिलता है, जैसे सूरज चमकता है, हवा बहती है…बस वैसे ही। कोई मतलब नहीं, कोई उद्देश्य नहीं है, इन बातों का।

आपमें से यदि कोई इसे पढ़ रहा हो और यह सोच रहा हो कि यह सब क्या अनर्गल प्रलाप है, बेतुकी बातें हैं तो…आपको कोई भ्रम न हो, इसीलिए मैंने इस भूमिका को लिख डाला है।

पिछली पोस्ट में प्राण की चर्चा हुई थी। यह जो शरीर और प्राण की बातें हैं, वह शरीर-विज्ञान और चिकित्सा-विज्ञान के आधार पर नहीं है। मैं इन क्षेत्रों का विशेषज्ञ नहीं हूँ। जिन विषयों का मैं किसी हद तक प्रामाणिक ज्ञान रखता हूँ, उनकी शब्दावली का प्रयोग करते हुए मैं ये बातें कर रहा हूँ।

शरीर और प्राण के रिश्ते को कुछ यों बयां किया जा सकता है कि जब तक शरीर में प्राण का प्रवाह कायम रहता है, तब तक शरीर जीवित रहता है। तो क्या ऐसा है कि शरीर जब तक इस हालत में रहे कि प्राण का प्रवाह उसके भीतर सतत कायम रह सके, तब तक शरीर जीवित रहेगा? शायद नहीं। शरीर और प्राण का संबंध बस इतने तक सीमित नहीं है। वह अन्य कई शर्तों पर भी निर्भर है। पर, उनकी बातें आगे फिर कभी।

हमारे शरीर में प्राण कहाँ रहता है, किस रूप में रहता है? कह सकते हैं कि हमारे शरीर के रक्त में घुली हुई ऑक्सीजन एवं अन्य मूल तत्वों के रूप में। लेकिन नहीं, बात इससे कहीं अधिक गहरी है। प्राण वह प्राकृतिक ऊर्जा है जिसके कारण रक्त उन मूल तत्वों को धारण कर पाता है। और, इसकी सतत आपूर्ति हमें भोजन, पानी और हवा के संश्लेषण से होती है।

तो, इसका अर्थ हुआ कि प्राण भी एक ऐसी ऊर्जा है जो पदार्थ से रूपांतरित होकर बनती है, और उसका स्रोत प्रकृति है।

मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि जीव-जंतुओं के शरीर, वनस्पति, जल, हवा और सूर्य का प्रकाश ही प्राण के मूल स्रोत हैं। ये सब एक ऐसी नैसर्गिक प्रक्रिया के द्वारा प्राण का रूपांतरण करते हैं कि हम उसे कृत्रिम रूप से नहीं बना सकते।

आज का विज्ञान शायद कृत्रिम शरीर बना सकता है, या कहें बनाने लगा है। रोबोट और क्लोन कृत्रिम शरीर ही हैं। रोबोट पर काम चूँकि अधिक तेजी से हुआ है तो कह सकते हैं कि आने वाले दौर में हमारे दैनिक जीवन में रोबोट का इस्तेमाल व्यापक प्रचलन में आ जाए। रोबोट में प्राण नहीं होता, वह उसी ऊर्जा से चलता है, जिससे बाकी कृत्रिम यंत्र चलते हैं। क्लोन की बात दूसरी है। वह प्राण से संचालित होता है। लेकिन किसी मनुष्य के क्लोन और वास्तविक मनुष्य में बहुत फर्क है। दोनों के पास शरीर और प्राण हैं। इस मामले में दोनों एक समान हो सकते हैं। पर वह क्या है, जो कि किसी क्लोन को वास्तविक मनुष्य से अलग करता है। इसके बारे में अगली पोस्ट में….

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प्राण : शरीर को संचालित करने वाली ऊर्जा

आज मैं ‘प्राण’ की बात करने जा रहा हूँ। उस प्राण की नहीं, जो हिन्दी सिनेमा जगत के बेहतरीन कलाकारों में से एक रहे हैं और आज भी 92 साल की उम्र में हमारे बीच मौजूद हैं। हाँ, एक बात तो है कि सिने कलाकार प्राण ने अपने नाम को वाकई सार्थक किया है।

पिछली पोस्ट में मैंने शरीर का जिक्र किया था। शरीर, जो रासायनिक तत्वों से मिलकर बना पदार्थ है, जिसे हमारी पौराणिक शब्दावली में पंच तत्वों से मिलकर बना माना जाता है। यह शरीर एक यंत्र है। प्रकृति का बनाया हुआ एक यंत्र, जो जैव प्रक्रियाओं से बनता है। इस शरीर की बनावट अद्भुत है। यह इतना जटिल है कि आज तक के वैज्ञानिक अध्ययनों-परीक्षणों से भी इसे पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। खासकर मस्तिष्क वाला हिस्सा तो एक अबूझ पहेली की तरह हमारे विज्ञान के सामने लंबे अरसे से चुनौती के रूप में रहा है। खैर…

हम अब तक अपनी वैज्ञानिक तरक्की के बल पर इतना कर पाए हैं कि शरीर जिन जैव प्रक्रियाओं से बनता है, उसे जान गए हैं और उन प्रक्रियाओं को दूसरे तरीके से दोहरा कर नए शरीर बना पाने में सक्षम हो रहे हैं। परखनली शिशु, कृत्रिम गर्भाधान, क्लोनिंग आदि आधुनिक विधियों का विकास वाकई एक बड़ी वैज्ञानिक प्रगति है। हो सकता है कि आने वाले वक्त में हम मनुष्य की क्लोनिंग करने में भी सक्षम हो जाएं और आने वाले दौर में शरीर बनाने की फैक्ट्रियाँ भी बन जाएं।

हर यंत्र की तरह शरीर रूपी यंत्र को चलाने के लिए भी ऊर्जा की जरूरत पड़ती है, अन्यथा वह बेजान, निष्प्राण, बेकाम हो जाती है। हमारे शरीर को चलाने के लिए जिस ऊर्जा की जरूरत पड़ती है उसे प्राण कहा जाता है। प्राण ही वह ऊर्जा है जो हर सचेतन को, चाहे वह जीव-जंतु हो या वनस्पति, संचालित करती है। मनुष्य के बनाए जड़ यंत्रों को चलाने के लिए जिस तरह ऊर्जा यानी बिजली की जरूरत पड़ती है, उसी तरह प्रकृति के बनाए सचेतन यंत्रों को चलाने के लिए प्राण की जरूरत पड़ती है। केवल नाम का फर्क है, वह भी केवल यह दर्शाने मात्र के लिए कि पहला जड़ यंत्र को संचालित करता है तो दूसरा चेतन यंत्र को।

हम अपने आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों के द्वारा ऊर्जा के बारे में काफी कुछ जानते हैं। यह भी जानते हैं कि ऊर्जा दरअसल पदार्थ से भी रूपांतरित होकर बनती है और एक रूप में पहले से मौजूद ऊर्जा को भी किसी दूसरे रूप में बदला जा सकता है। इस जानकारी का उपयोग करके हम ऊर्जा का रूपांतरण करते हैं और अपने समस्त यंत्रों को चलाते हैं।

इस संसार के बारे में हम जो कुछ जानते हैं, वह जड़ हो या चेतन, असल में केवल पदार्थ और ऊर्जा ही हैं। यदि हम अपनी बात चेतन जगत तक सीमित रखें तो कहेंगे कि शरीर है और प्राण है, इनके अलावा और कुछ नहीं। हमारा विज्ञान यही मानता है। विज्ञान-सम्मत सत्य यही है। हालांकि वास्तविक सत्य इससे अधिक हो सकता है, पर उसकी चर्चा फिर कभी।

आज हमें प्राण के बारे में बात करनी है। प्राण के बारे में हम-आप क्या जानते हैं? हम इतना जानते हैं कि प्राण हम चेतन जीवों को भोजन, पानी और हवा को ग्रहण करने से मिलता रहता है। यदि हम इन्हें ग्रहण करना छोड़ दें तो प्राण की अविरल धारा टूट जाएगी और हम निष्प्राण हो जाएंगे। हम प्राण को धारण करते हैं, इसीलिए तो हम प्राणी कहलाते हैं।

मगर, क्या हम जानते हैं कि शरीर में प्राण का पहली बार प्रवेश और शरीर से प्राण का अंतिम बार निकास किन प्रक्रियाओं से होता है? शरीर में प्राण के पहली बार प्रवेश को जन्म कहते हैं और शरीर से अंतिम बार प्राण के निकास को मृत्यु कहते हैं। हम जन्म और मृत्यु के बारे में क्या जानते हैं, कितना जानते हैं? यदि जान सकते तो हमारा जन्म और मृत्यु पर नियंत्रण होता!

यह हमारे जीवन के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है। हमारा अब तक का वैज्ञानिक विकास और अध्ययन, इस विषय पर प्राथमिक अवस्था में है। यदि आपमें से कोई पाठक इस विषय पर ऐसा कुछ जानता है जिससे जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझने में किसी हद तक मदद मिल सके तो आप जरूर साझा कीजिए।

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मध्यान्तर के बाद

मैं जिस शरीर में हूं, उसने संभवत: अपनी आधी आयु पार कर ली है। जो शरीर मुझे प्रारब्ध से माँ-बाप के माध्यम से मिला है, उसकी जितनी बेहतर देखभाल मुझे करनी चाहिए थी, वैसी मैं नहीं कर पाया हूँ। एक तरह से उसकी उपेक्षा ही की है अब तक मैंने। इसलिए जिस शरीर को लगभग सौ साल तक मौजूद बने रहना चाहिए, वह उतना तो कदापि टिक नहीं सकेगा। हालांकि मेरी कोशिश रहेगी कि यह शरीर अब जिस भी हालत में है, उसके स्वास्थ्य की रक्षा में मेरी उपेक्षा या लापरवाही के कारण कोई बाधा न आए और वह स्वाभाविक गति से ही ह्रास को प्राप्त हो।

मैं जिस देश, काल और परिस्थिति में पैदा हुआ और नियति ने जिस मझधार में मुझे लाकर खड़ा कर दिया है, वहां से इस शरीर की यात्रा जारी रहने तक शेष बचे समय में मुझे अपनी ऊर्जा को कोई ऐसी दिशा देनी है, जिससे कि शरीर छोड़ते समय तक मेरे भीतर शांति जीवंत बनी रहे और चारों ओर आनन्द का भाव भी छाया रहे।

बीते एक अंतराल में, जब मैंने खुद को एक तरह से भीतर समेट लिया था, और आत्म-निरीक्षण एवं आत्म-सुधार की कसरतों में व्यस्त-सा था, तब भी मैंने फेसबुक और ट्विटर जैसे माइक्रोब्लॉगिंग के मंचों के माध्यम से आप सभी सहयात्रियों के साथ संवाद के लिए एक खिड़की खोल रखी थी और जब-तब उसमें से झांक भी लिया करता था और कभी-कभार कुछ स्फुट शब्द बिखेरकर अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाने की भी कोशिश करता था।

तो उन बीते कुछ वर्षों में, इस ब्लॉग के माध्यम से मेरे कुछ शब्दों से आप साथियों ने मेरे बारे में, मेरी सोच और उद्देश्य के बारे में, मेरे कार्यों और प्रतिक्रियाओं के बारे में जो कुछ जाना-समझा हो, उससे ऐसी कोई कहानी तो नहीं ही बनती है जो कि यादगार हो, जिसमें रस लेने लायक ऐसा कुछ हो कि उससे आपका कुछ मनोरंजन हो सके, या फिर जिसमें ऐसा कोई तत्व भी मौजूद हो, जो आने वाली नस्लों के खोजी जीवों के लिए प्रेरणा या बोध जगाने में किसी हद तक सहायक हो सके। फिर भी, इतना इत्मीनान है कि अब तक की जिंदगी कोई बर्बाद नहीं हुई है। मन दुविधाओं-उलझनों से मुक्त हो चुका है। यूँ कह सकते हैं कि फंडे क्लीयर हो गए हैं। आगे जो करना है, वह साफ दिख रहा है…हालांकि योजना बनाने जैसा कुछ नहीं है। जीवन सहज-स्वाभाविक गति से आगे बढ़ेगा अब स्वत:स्फूर्त ढंग से।

जिंदगी की इस पटकथा के मध्यांतर के बाद अब मेरे सामने यह दायित्व-सा आन पड़ा है कि शेष बचे समय में ऐसा कुछ करूँ जो वाकई सार्थक-किस्म का हो, जिसमें कुछ ऐसा रोमांच, आनन्द, रस हो कि मेरे साथ-साथ आपको भी कुछ मजा आ जाए और जिन पीढ़ियों को हम अपने पीछे छोड़ जाएं, वे यदि कभी भूले-भटके भी इधर से गुजरें तो कह सकें कि इसमें शोध करने लायक या बोध कराने लायक कोई बात भी है।

तो दोस्तों, इस शेष बची जीवन-कथा को किसी-न-किसी बहाने मैं आपके साथ साझा करने की कोशिश जरूर करूंगा। पता नहीं कि मैं आपकी भीतर कोई ऐसी दिलचस्पी जगा पाऊंगा कि नहीं, जिससे कि आप भी इस कथा में एक किरदार बनकर शामिल होने के लिए मचल उठें और हम सब मिलकर अपने दौर की कोई यादगार महागाथा रच डालें!  पर, देखते हैं….

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बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बां में बोलिये

स्कूल के दिनों में समूह प्रार्थना करते समय हमारे कुछ मुसलमान सहपाठी पंक्ति में शामिल तो होते थे, पर मौन रहते थे और उनके हाथों की मुद्रा भी विश्राम में रहती थी। यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष शब्दावली वाली प्रार्थनाओं या राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के समय भी उनका अंदाज वही रहता था। एक बार टोका तो उनमें से एक ने बताया कि वे ऐसा अपनी धार्मिक मान्यतायों के कारण करते हैं। लेकिन इस बात को लेकर हमारे यहां कोई मुद्दा बना हो, ऐसा याद नहीं आता।

जब कॉलेज में थे तो एक बार पढ़ने में आया कि केरल के एक स्कूल से एक खास समुदाय के कुछ बच्चों को इसलिए निकाल दिया गया था वे राष्ट्रगान के समय सबके साथ खड़े तो रहते थे, मगर उसे गाते नहीं थे। वह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा था और अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि

यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र-गान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है।

लेकिन, उसके बाद भी जब कभी स्कूलों में वन्दे मातरम् के गायन को अनिवार्य किए जाने के प्रयास हुए तो उस पर उठे हंगामे को शांत करने के लिए समाधान यही सुझाया गया कि इसे थोपा नहीं जाना चाहिए कि हर कोई इसे गाये ही, लेकिन उसका सम्मान वह जरूर करे।

हाल ही में मध्य प्रदेश के स्कूलों में बच्चों के लिए सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और अब, गीता की शिक्षा को अनिवार्य किए जाने पर भी ऐसा ही विवाद देखने को मिला।

जंतर-मंतर पर अन्ना के अनशन के दौरान बनाए गए मंच की पृष्ठभूमि में भारत माता की मौजूदगी को लेकर भी इतने सवाल उठाए गए कि रामलीला मैदान में अनशन के दौरान आयोजकों को यह जरूरी लगा कि मंच की पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी का चित्र लगाकर धर्मनिरपेक्षता का परिचय दिया जाए।

जंतर-मंतर पर अण्णा हजारे

रामलीला मैदान में अण्णा हजारे

धर्मनिरपेक्षता बरतने की इतनी कोशिश के बाद भी अण्णा द्वारा ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगवाए जाने पर जामा मस्जिद के इमाम के नाराज होने और टीम अन्ना द्वारा इमाम को मनाए जाने की कोशिश के वाकये पर लखनऊ के एक शायर काज़िम जरवली ने कुछ यूँ अर्ज़ किया:

बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बा मे बोलिये,
फर्क मतलब पर नहीं पड़ता है ख़ालिक़ कि क़सम ।
“माँ के पैरो मे है जन्नत” क़ौल है मासूम का,
मै मुसल्ले पर भी कह सकता हुं “वन्दे मातरम” ।।

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने एक खत भी लिखा:

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ने फ़रमाया है कि “जन्नत माँ के पैरों के नीचे है” अर्थात् माँ वन्दनीय है। यह एक साफ़ मुस्लिम दृष्टिकोण है। किसी आन्दोलन में भाग लेना या विरोध करना एक निजी फैसला हो सकता है, लेकिन धर्म के नाम पर इसका विरोध निन्दनीय है; और वन्दे मातरम कहने में इस्लामिक दृष्टिकोण से कोई बुराई नहीं है।

वन्दे मातरम का मतलब है कि हे माँ, आप पूज्य हैं और वास्तव में माँ पूज्य है। माँ को पूजनीय कहने में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह केवल शब्दों का हेरफेर भर है, वरना किस मुसलमान के लिए माँ पूजनीय नहीं है, अर्थात् सब पूजनीय मानते हैं।

केवल इस वजह से माँ को पूज्य मानने से इनकार करना कि ये शब्द (वन्दे मातरम) हिंदी में कहे गए हैं, इसे केवल एक संकीर्ण मानसिकता ही कहा जा सकता है। वे इसे मुसल्ले (नमाज़ पढ़ने का पवित्र कपड़ा) पर भी कह सकते हैं, क्योंकि माँ को पूज्य होने का दर्जा उसी पैग़म्बर ने दिया है जिसने नमाज़ पढने को कहा है। यह कहाँ का तर्क है कि एक कहा माने और एक कहा न माने।

माँ को पूज्य मानने या कहने का मतलब यह कदापि नहीं कि उसको भगवान मान लिया है; और वो हमारे कहते ही अब ईश्वर हो गयी; और ये दो ईश्वरवाद का सिद्धांत हो गया। हे संकीर्ण मानसिकता वालों, माँ को भगवान् हिन्दू भी नहीं मानते, बल्कि कोई धर्म माँ को ईश्वर नहीं मानता। हिन्दू धर्म में मातृभूमि को माँ का दर्जा दिया जाता है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। देश से प्यार करना एक गर्व की बात है। कोई नास्तिक भी इसका विरोध नहीं कर सकता। भगवान के मानने वालों की तो बात ही अलग है। यहाँ पर यह विदित रहे, इसलिए मुस्लिम इतिहास का हवाला दिया जा रहा कि पैग़म्बर मुहम्मद ने अपने जीवन में सिर्फ एक बार आक्रमण किया। यह आक्रमण मक्का, जो उनकी मातृभूमि थी, उसमें रहने का हक़ पाने के लिए किया गया था। इस्लाम में भी देशप्रेम की भावना को उचित और ज़रूरी बताया गया है।

यहाँ पर प्रकट विचारों का अभिप्राय किसी धर्म-विशेष को अच्छा-बुरा बताना या किसी आन्दोलन को सही या गलत क़रार देना नहीं है। बल्कि धर्म के नाम पर नफरत व द्वेष का वातावरण न पैदा होने देना है। यदि कोई इन निजी विचारों से सहमत नहीं है तो वह इसके लिए बाध्य भी नहीं है। हमारा विनम्र निवेदन यही होगा कि न बुखारी को माने, न तोगड़िया के उग्र भाषणों से प्रेरित हों, बल्कि अपने अन्दर बैठे विकेक का प्रयोग करे, तब सही या गलत का निर्णय ले ।

लखनऊ के निकट जरवल में 1955 में जन्मे क़ाजिम जरवली फिलहाल लखनऊ के शिया कॉलेज में कार्यरत हैं और देश-विदेश में आयोजित होने वाले मुशायरों में भाग लेते रहते हैं और कई पुरस्कारों से भी वह नवाजे जा चुके हैं। उनकी रचनाओं के कुछ संकलन भी प्रकाशित हुए हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी रचनाओं को अपने ब्लॉग पर भी डालना शुरू किया है और कविता कोश पर भी वे रचनाएं उपलब्ध हैं।  

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