अपने एक मित्र से मिलने गया था। उनके कार्यालय की दीवार पर टँगे एक वाक्य पर नज़र गई। लिखा था, “सपने वे नहीं होते जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते।” उस वाक्य में निहित प्रेरणा देर तक मन में गूंजती रही। किंतु फिलहाल, मैं उन्हीं सपनों की बात कर रहा हूँ जो हम सोते समय देखते हैं, उनकी नहीं जो हमें सोने नहीं देते।
सपने मुझे अक्सर हैरान करते रहे हैं।
बायीं कलाई में मोच आ जाने की वज़ह से एक अरसे तक दर्द से परेशान रहा। तकरीबन महीने भर फिजियोथिरैपी और अल्ट्रा-सोनिक थिरैपी चली, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। डिजिटल एक्स-रे से भी डॉक्टर को किसी ‘डिस्लोकेशन’ का पता नहीं चला। डॉक्टर ने नुस्ख़े में पहले पेन-किलर गोलियाँ और बाद में, इंजेक्शन लेने की सलाह दी। कंप्यूटर की-बोर्ड का इस्तेमाल कम-से-कम करने और कलाई पर क्रेप-बैंड बांध कर रखने को भी कहा। सारे उपाय आजमा कर देख लिए, मगर दर्द दूर होने का नाम नहीं ले रहा था।
दर्द से अधिक मुझे दर्द की वज़ह के इलाज की जरूरत थी। आयुर्वेद के विशेषज्ञ को दिखलाया तो उन्होंने पुनर्नवा के सेवन और क्षीर बला तेल से मालिश की सलाह दी। उससे भी कोई खास लाभ नहीं हुआ।
यदि अपने गाँव में रह रहा होता तो मुझे विश्वास है कि पड़ोस की बुढ़िया नानी इस दर्द को मिनट भर में ठीक कर दी होती। बचपन में खेलते हुए या फिसल कर गिरने से जब कभी हाथ-पैर में इस तरह की मोच आई तो माँ फौरन उनके पास ले जाती थीं। वह हाथों से टटोलकर ‘डिस्लोकेलन’ का पता लेती थी और मुझे बातों में उलझा कर एक झटके में ‘कट’ से पसली को यथास्थान बिठा देती थी और एक-दो बार की मालिश के बाद दर्द पूरी तरह से गायब हो जाया करता था।
मगर यहां दिल्ली में, बड़े अस्पतालों के विशेषज्ञ डॉक्टर इस साधारण-से दर्द का सही उपचार नहीं कर पा रहे थे। हारकर मैंने डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया और दवा लेनी भी बंद कर दी। पर हाथों का सूक्ष्म व्यायाम और मालिश करना जारी रखा। हालांकि कलाई को क्लॉक-वाइज और एंटी क्लॉक-वाइज घुमाने में भी दर्द होता था और मुट्ठी बंद कर पाना भी कठिन था।
मगर परसों रात गज़ब हो गया। सपने के दौरान किसी अज्ञात प्रेरणा से मेरे दाहिने हाथ ने बायें हाथ की कलाई को अचानक एक खास कोण पर ‘खट’ से मोड़ दिया। मेरी नींद खुल गई और जब मैंने कलाई को दबा कर, तरह-तरह से मोड़ कर देखा तो दर्द पूरी तरह से गायब हो चुका था।
तो क्या मेरे अवचेतन मन को कलाई के उस खास कोण का पता था जहां डिस्लोकेशन था और क्या सपने के दौरान उसी ने दाहिने हाथ को उतने सटीक रूप-से निर्देशित कर दिया था?
एक दूसरी घटना भी याद आ रही है। कंप्यूटर पर इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड से अभी जो मैं हिन्दी में टाइप कर रहा हूँ, उसका अभ्यास भी सपने में ही हुआ था। अख़बार की नौकरी के दौरान पहली बार जब कंप्यूटर पर खुद से टाइप कर आलेख तैयार करना था तो साथियों से पूछ-पूछकर मैंने काग़ज पर की-बोर्ड का लेआउट बना लिया और उसे देख-देखकर आलेख टाइप कर लिया था। मगर रात को लौटकर घर आने के बाद नींद में सपने के दौरान भी टाइपिंग जारी रही। अगले दिन ऑफिस में कंप्यूटर पर जब काम करना शुरू किया तो इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड पर मेरी टंकण गति सहज हो चुकी थी। जबकि दूसरे ज्यादातर लोगों को इंस्क्रिप्ट पर सहज होने में अमूमन कुछ सप्ताह तो लग ही जाते हैं।
ड्राइविंग सीखने के शुरुआती दिनों में मुझे टॉप गियर लगाने में बड़ी दिक्कत हो रही थी। चौथे गियर से पाँचवे गियर में जाने के बजाय अक्सर थर्ड गियर लग जाया करता था। एक रात सपने में ड्राइविंग करते हुए टॉप गियर का अभ्यास हो गया। सुबह ऑफिस जाते हुए मैं बड़ी सहजता से बारंबार टॉप गियर लगा पा रहा था।
स्कूल के दिनों में जब इम्तहान का दौर चलता था तो कभी-कभी नींद में भी परीक्षा के सपने आ जाते थे। जब कभी ऐसे सपने आते थे तो अगले दिन का पेपर बहुत अच्छा जाता था। ऐसा लगता था कि सपने में उन प्रश्नों का अभ्यास पहले ही हो चुका है।
लेकिन एक स्वप्न तो वाकई अदभुत था। वर्षों तक कुछ दार्शनिक जिज्ञासाओं ने मेरे मन को मथ रखा था। दीवानों की तरह मैं दिन-रात किताबों में उन सवालों के हल खोजता रहता था। जब किताबें व्यर्थ मालूम पड़ने लगीं तो घंटों ध्यान की गहराइयों में उतर कर समाधान पाने की चेष्टा भी करता था। मगर एक रात सपने के दौरान एक विलक्षण अनुभूति से गुजरा और उसके बाद ऐसा लगा कि सारी गुत्थियाँ सुलझ गईं हैं।
ऐसे दर्जनों स्वप्न हैं जिनकी अनुभूति मेरे चेतन मन पर आज भी छाई हुई हैं। कई बार उनसे प्रत्यक्ष जीवन की ऐसी समस्याओं के समाधान भी प्राप्त हुए हैं जिनके लिए मेरे सारी कोशिशें विफल हो चुकी थीं।
हम अपनी एक-तिहाई जिंदगी सोते हुए बिताते हैं और कुल जीवन का छठा भाग सपने देखते हुए गुजार देते हैं, मगर सपनों के बारे में हम बहुत ज्यादा नहीं जानते। हमें ज्यादातर सपने याद नहीं रह पाते। अपने सपनों की अक्सर हम परवाह नहीं करते। ज्यादातर सपने नजरंदाज करने लायक होते भी हैं, पर कुछ ऐसे सार्थक सपने भी होते हैं, जिनमें हमारी जिंदगी की गुत्थियों को सुलझाने की कुंजी छिपी होती है। इन्हें मनोवैज्ञानिक शब्दावली में सचेतन स्वप्न या Lucid Dreaming कहा जाता है।
इन सपनों की खासियत यह होती है कि इन्हें देखते समय द्रष्टा को यह भान भी बना रहता है कि वह स्वप्न देख रहा है और उस दौरान वह मानसिक और कुछ हद तक शारीरिक रूप से भी सक्रिय रहता है। स्वप्न-भंग के बाद उसे किसी अचंभे का अहसास नहीं होता। जागृति के बाद भी स्वप्न की स्मृति बनी रहती है और स्वप्न के दौरान घटे विचार-क्रम या घटनाक्रम का प्रभाव बाद में भी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है।
हम जिस स्थूल लोक में रहते हैं और जिस सूक्ष्म लोक से नियंत्रित होते हैं, कई बार ऐसा लगता है कि सपने उन दोनों लोकों के बीच संवाद-संपर्क-संबंध के सेतु हों। हम जितना ही अपने सपनों के प्रति सजग होते हैं, उतना ही अपने को, अपने जीवन के मक़सद को बेहतर समझ पाते हैं। दुनिया के रंगमंच पर हमारी अपनी भूमिका क्या हो, कैसी हो, इसके सबसे सही सूत्र हमें अपने सपनों से ही प्राप्त हो सकते हैं।
सपनों के रहस्य-लोक में हम जितने गहरे उतरते हैं, ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा और कला के क्षेत्र के अनोखे और अपूर्व सूत्र हाथ लगते हैं। फ्रायड, जुंग, एडलर, पर्ल्स, हॉब्सन, मैककार्लि, सोल्म्स, झांग, फेरेंस्ज़ी, ग्रिफिन, हॉल जैसे आधुनिक स्वप्नविदों (oneirologist) के प्रयासों के कारण सपनों के तिलिस्म की दुनिया कुछ-कुछ खुलने लगी है। मगर अब भी यह दुनिया मानव के लिए काफी हद तक अबूझ पहेली ही बनी हुई है। स्वप्न-सागर की अतल गहराइयों में छिपे अनगिनत ज्ञान-रत्नों को प्रकाश में लाने के लिए निरंतर सघन और व्यवस्थित अध्ययन की जरूरत है।
क्या आप भी कभी अपने सपनों को लेकर हैरान हुए हैं? क्या सपनों ने कभी आपको जीवन की राह दिखाई है?
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