टहलने जैसी बुनियादी आदत का छूट जाना कभी-कभी बिल्कुल अस्वाभाविक-सा लगता है। किंतु जब अपनी सेहत पर इसके दूरगामी असर को महसूस करता हूं तो बेहद अफसोस होता है। अपने फिटनेस को कायम नहीं रख पाना और ब्लड प्रेशर, हाइपो थायराइड, हाइपरटेंशन, मोटापा जैसे लाइफ स्टाइल से जुड़े रोगों की चपेट में आ जाना किसी गुनाह से कम नहीं है।
पिछले कुछ वर्षों से सुबह-शाम टहलने का सिलसिला लगभग छूट-सा गया है। यह समय अब ज्यादातर बेटी की देखभाल में गुजरता है, जो लगभग दो वर्ष की होने जा रही है। उसके घर में आने से पहले ही इंटरनेट और खासकर ब्लॉगिंग की लत ने टहलने की आदत में सेंध लगा दी थी।
बेटी के पदार्पण के बाद ब्लॉगिंग की लत एक तरह से छूट-सी गई, मगर तब तक शरीर के आकार और वजन में असंतुलन स्पष्ट नज़र आने लगा था। हालांकि रात को सोने से पहले कुछ देर टहलने का सिलसिला शुरू करने की कोशिश की, पर उसे भी रोज-रोज निभा पाना मुमकिन नहीं हो सका। क्योंकि अपनी दिनचर्या श्रीमतीजी की शिफ्ट ड्यूटी के हिसाब से हर हफ्ते बदल जाती है।
किसी मित्र-शुभचिंतक से इन दिनों जब अरसे बाद मुलाकात होती है तो बढ़ते तोंद को लेकर नसीहत सुनने के लिए तैयार रहता हूं। अभी हाल में एक पुराने मित्र बरसों बाद घर पधारे। पुलिस में इंस्पेक्टर हैं और सेहत को लेकर आदतन ही नहीं, प्रोफेशनली भी बेहद सचेत हैं। देर तक वह मोटापे की दस्तक से आगाह करते रहे, और तरह-तरह के टिप्स बताते रहे।
वैसे तो पिछले कुछ वर्षों से बाबा रामदेव की चहुँ ओर धूम है और उनके योग शिविरों में जाकर या घर बैठे टेलीविजन के सामने बैठकर कपालभाति और अनुलोम-विलोम का अभ्यास करके अपनी सेहत में सुधार लाने वाले उद्यमियों की तादाद करोड़ों में बताई जाती है। पर अपन अभागे हैं, उन करोड़ों लोगों में अब तक शामिल नहीं हो पाए हैं।
फिलहाल तो हम टहलने की अपनी आदत को फिर से नियमित बनाने की चेष्टा में लगे हैं। सुबह-शाम न सही, दोपहर में, लंच के बाद ऑफिस के दो-एक सहकर्मियों के साथ लगभग नियमित रूप से आधे घंटे की सैर पर निकलते हैं। सर्दी हो या गर्मी हो या बरसात हो– इस सिलसिले को पिछले दो वर्ष से कायम रखने की पूरी कोशिश की जा रही है।
अपने-आप में यह रोमांचकारी अनुभव है। खासकर, इन दिनों जब तापमान आम तौर पर चालीस डिग्री से ऊपर ही होता है, दफ्तर के वातानुकूलित माहौल से निकलकर थोड़ी देर के लिए तेज धूप की तपिश को तेज कदमों से चलते हुए भीतर तक महसूस करना और वापस एसी के शीतल माहौल में लौटकर राहत की सांस महसूस करना एक अलग ही मजा देता है। केन्द्रीय दिल्ली के हरित क्षेत्र में सड़क के दोनों किनारों पर घने वृक्षों की छाया में दुपहरिया में टहलने का आनंद ही कुछ और है।
विज्ञान और टेक्नोलॉजी के आज के दौर में जैसे-जैसे हमलोगों की साधन-संपन्नता बढ़ रही है, हम बदलते मौसम के अंतरंग अनुभव से कटते जा रहे हैं। तो ऐसे में गीता के श्रीकृष्ण की यह सलाह कहीं अधिक प्रासंगिक मालूम पड़ती है :
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।
(हे कुन्ती पुत्र ! सर्दी-गर्मी और सुख-दु:ख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति, विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिये हे भारत ! उनको तू सहन कर।।)
अब लगता है कि नियति भी इस मामले में मेरा साथ देने वाली है। कई वर्षों बाद अब फिर, दफ्तर से एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर आवास की सुविधा मिल गई है। घर के सामने ही राष्ट्रीय स्तर का एक योग प्रशिक्षण संस्थान भी है। तो, कम-से-कम घर से दफ्तर आने-जाने के लिए गाड़ी का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के पैदल चलने की आदत फिर से पड़ जाएगी। पड़ोस के योग संस्थान से दो-एक महीने का प्रशिक्षण भी ले लेने की सोच रहा हूं।
आपलोगों की शुभकामनाएं रहीं तो लगता है कि खोई सेहत दोबारा से लौट सकेगी।
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