अत्यंत करीब है वह महापरिवर्तन, जिसका केन्द्र भारत बनेगा

450px-Buddhism-Symbolयुगों-युगों से मानव की समष्टि संवेदना जिस धर्म-चक्र से संचालित होती रही है, उस धर्म-चक्र की स्वाभाविक गति भी धरती पर देश, काल और परिस्थिति-जन्य प्रतिरोध से प्रभावित होती है। इसलिए उस गति को नियमित और निर्बाध बनाए रखने के लिए अवतार, युगपुरुष, पैगम्बर, मसीहा, सदगुरु आदि की उपाधि से प्रख्यात महामानव समय-समय पर हस्तक्षेप करते रहे हैं।

किंतु, ऐसे हर महामानव को अपने हस्तक्षेप की प्रभाव-अवधि का बोध भी रहा है, जिसके बाद पुन: नए हस्तक्षेप की जरूरत का पूर्व-संकेत भी वे कर जाते रहे हैं

हम जिस वर्तमान दौर से गुजर रहे हैं, उसमें ऐसे हस्तक्षेपों की शृंखला में कृष्ण के 5000 वर्ष, ज़रथुष्ट्र के 3000 वर्ष, बुद्घ के 2500 वर्ष, ईसा के 2000 वर्ष और मोहम्मद के 1400 वर्ष तक के प्रभाव की मियाद पहले ही एक साथ खत्म हो चली है।

धर्म-चक्र पर वर्तमान का संकेतक परिवर्तन की अपनी धुरी पर गतिशील रहते हुए अब जिस नए युग में प्रवेश करने जा रहा है, उसकी तैयारी के लिए विगत दो सदियों के दौरान कुछ अत्यंत करुणावान मार्गदर्शकों ने श्रमसाध्य भूमिका बना दी है। अगले दो-तीन दशक के भीतर मानवता को एक नई अभूतपूर्व छलांग लेनी है और उसका निमित्त किसी ऐसे अभूतपूर्व महामानव के नेतृत्व में एक परम विशिष्ट मंडली को बनना है, जो इस वक्त हमारे बीच मौजूद है। इस महापरिवर्तन का केन्द्र भारत रहेगा और इसी 21वीं सदी में यह देश अपने गौरव के शिखर पर फिर से पहुँच जाएगा। इस परिघटना के साक्षी हममें से अधिकतर व्यक्ति बन सकेंगे। अतीत की सारी रहस्यवादी भविष्यवाणियाँ भी इसी ओर संकेत करती हैं।

अब विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने समूचे विश्व को इस तरह से जोड़ दिया है कि अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और अलग-अलग काल खंडों में अलग-अलग हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ेगी। संचार-क्रांति का घोड़ा अपने-आप ही एक ही साथ अखिल विश्व में दौड़ लगाकर शाश्वत धर्म का नव संदेश सर्वत्र पहुँचा देगा।

क्या हम इसके लिए अपनी तरफ से तैयार हैं? या फिर, इन बातों को बेसिर-पैर की कपोल-कल्पना मानकर हवा में उड़ा देने की मानसिकता लिए यथास्थितिवादी बने बैठे रहने वाले हैं?

(मेरी फेसबुक टाइमलाइन पर 18 अगस्त, 2014 को पूर्व-प्रकाशित)

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‘गाँधी मुझे केवल कठपुतली के रूप में बर्दाश्त कर सकते थे’

614935_10152391708576378_6483898400132411414_oभारतीय स्वतंत्रता के इतिहास के प्रचलित अध्ययन के क्रम में इस तथ्य पर बहुत कम ध्यान दिया जाता रहा है कि सुभाष चन्द्र बोस को किन परिस्थितियों में महात्मा गाँधी के प्रभुत्व वाली कांग्रेस पार्टी से अपनी राह अलग करने और आखिरकार देश छोड़कर विदेशों से भारत की आजादी की लड़ाई जारी रखने के लिए विवश होना पड़ा था। इस सच को जानने के लिए जरूरी है कि स्वयं सुभाष चन्द्र बोस द्वारा भारतीय स्वाधीनता पर दो खंडों में लिखित इतिहास की पुस्तक ‘The Indian Struggle’ के इन प्रासंगिक अंशों पर गौर फरमाया जाए, जो गाँधी बनाम सुभाष के विवाद की उस पृष्ठभूमि पर अत्यंत प्रामाणिकता से प्रकाश डालती है:

Bose_Gandhi_1938

“मेरे और गाँधी समर्थकों के बीच की दरार तब तक काफी बढ़ चुकी थी, पर जनता को यह सब पता नहीं था। इसलिए जनवरी, 1939 में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में गांधी व उनके समर्थकों और पंडित नेहरू ने मेरा पुरजोर विरोध किया। इसके बावजूद मैं सहज बहुमत से विजयी रहा। यह 1923-24 के बाद महात्मा गांधी की पहली सार्वजनिक पराजय थी और उन्होंने भी अपने साप्ताहिक पत्र ‘हरिजन’ में इस हार को खुलकर कबूल किया। इस चुनाव से यह साफ हो गया कि गाँधी और नेहरू, दोनों के द्वारा खुलकर विरोध किए जाने के बावजूद देश भर में मुझे कितना व्यापक और प्रभावी समर्थन हासिल था।

मार्च, 1939 में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए मैंने एक स्पष्ट प्रस्ताव किया कि छ: महीने के भीतर स्वतंत्रता की माँग करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तरफ से ब्रिटिश सरकार को एक अल्टीमेटम तुरंत भेजा जाना चाहिए और इसके साथ ही हमें राष्ट्रव्यापी संघर्ष के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इस प्रस्ताव का गाँधी व उनके समर्थकों तथा नेहरू ने विरोध किया और उसे ठुकरा दिया। इस प्रकार स्थिति ऐसी बन गई कि यद्यपि कांग्रेस का अध्यक्ष मैं था, पर मेरा नेतृत्व उनके द्वारा स्वीकार नहीं किया जा रहा था।

इसके अलावा यह देखा गया कि हर संभव मौके पर गाँधी और उनके समर्थक कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष का इस इरादे के साथ विरोध करते रहे कि उसके लिए काम कर पाना असंभव हो जाए। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के भीतर पूरी तरह से गतिरोध कायम हो गया। इस गतिरोध को दूर किए जाने के दो ही रास्ते थे – या तो गाँधी व उनके समर्थक अपनी अवरोधक नीति छोड़ देते या फिर अध्यक्ष ही उनके समक्ष नतमस्तक हो जाता। सुलह-समझौते की कोई संभावना तलाशने के लिए महात्मा गाँधी और मेरे बीच सीधी वार्ताएँ हुईं, लेकिन वे विफल साबित हुईं।

कांग्रेस के संविधान के तहत अध्यक्ष को अगले वर्ष के लिए कार्यकारिणी समिति को नियुक्त करने का अधिकार था, लेकिन यह स्पष्ट हो चला था कि यदि कार्यकारिणी समिति गाँधी व उनके समर्थकों की पसंद के अनुरूप नियुक्त न की जाती, तो वे अपना विरोध जारी रखते। और कांग्रेस के भीतर गाँधी धड़े की स्थिति ऐसी थी कि उनकी तरफ से दृढ़तापूर्वक विरोध जारी रहने पर अध्यक्ष के लिए स्वतंत्र तरीके से काम कर पाना असंभव हो जाता।

गाँधी व उनके समर्थक न तो (कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर) मेरे नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार थे और न ही मुझे कांग्रेस की मशीनरी का नियंत्रण अपने हाथ में लेने दे रहे थे। वे मुझे केवल कठपुतली अध्यक्ष के रूप में बर्दाश्त कर सकते थे। इसके अलावा गाँधी धड़ा इस अर्थ में रणनीतिक लाभ की स्थिति में था कि वह कांग्रेस पार्टी के भीतर एक केन्द्रीय नेतृत्व के अधीन सक्रिय एकमात्र संगठित समूह था। कांग्रेस के भीतर वाम रुझान वाला समूह, जिनके समर्थन से मैं जनवरी, 1939 में अध्यक्ष के तौर पर दोबारा निर्वाचित हुआ था, संख्या के लिहाज से बहुमत में था, पर उसकी नकारात्मक बात यह थी कि वह गाँधी धड़े की तरह किसी एक नेतृत्व के अधीन संगठित नहीं था। उस वक्त तक पार्टी के भीतर ऐसा कोई नेतृत्व नहीं था जिसे समूचे वाम धड़े का विश्वास हासिल हो।….अत: कांग्रेस पार्टी के भीतर एक संगठित और अनुशासित वाम धड़े का गठन 1939 में भारत की प्रमुख राजनीतिक जरूरत बन गई थी।

महात्मा गाँधी और मेरे बीच हुई समझौता वार्ताओं से यह जाहिर हो गया कि एक तरफ गाँधी धड़ा मेरे नेतृत्व को कतई स्वीकार नहीं करेगा और दूसरी तरफ मैं कठपुतली अध्यक्ष बनने के लिए तैयार नहीं था। नतीजतन, मेरे लिए अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा। मैंने 29 अप्रैल, 1939 को इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस पार्टी के भीतर एक परिवर्तनकारी व प्रगतिशील समूह के गठन के लिए मैंने तुरंत कदम आगे बढ़ाए ताकि समूचा वाम धड़ा एक बैनर के तले एकजुट हो सके। इस पार्टी को ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ का नाम दिया गया। इस ब्लॉक का पहला अध्यक्ष मैं बना और उपाध्यक्ष (और अब कार्यकारी अध्यक्ष) पंजाब के सरदार शार्दूल सिंह कवेशीर बनाए गए।”

[The breach between the writer and the Gandhi Wing was now wide, though not visible to the public. At the Presidential election in January, 1939, he was therefore vigorously opposed by the Gandhi Wing as well as by Pandit Nehru. Nevertheless, he was victorious with a comfortable majority. This was the first time since 1923-24 that the Mahatma suffered a public defeat and in his weekly paper, Harijan, he openly acknowledged the defeat. The election has served to show the wide and influential following that the writer had, throughout the country, in open opposition to both Gandhi and Nehru.

In March, 1939, at the annual session of the Congress, the writer who presided made a clear proposal that the Indian National Congress should immediately send an ultimatum to the British Government demanding Independence within six months and should simultaneously prepare for a national struggle. This proposal was opposed by the Gandhi Wing and by Nehru and was thrown out. Thus a situation arose in which though the writer was the President of the Congress, his lead was not accepted by the body.

Moreover, it was seen that on every conceivable occasion, the Gandhi Wing was opposing the President with a view to making it impossible for him to function. A complete deadlock within the Congress was the result. There were two ways of removing this deadlock – either the Gandhi Wing should give up its obstructionist policy, or the President should submit to the Gandhi Wing. With a view to finding a possible compromise, direct negotiations between Mahatma Gandhi and the writer took place, but they proved to be abortive.

Under the constitution of the Congress, the President was entitled to appoint the Executive (Working Committee) for the coming year, but it was clear that the Gandhi Wing would continue to obstruct, if the Executive was not appointed according to its choice. And the position of the Gandhi Wing within the Congress was such that determined obstruction on its part would render it virtually impossible for the President to function in an independent manner.

The Gandhi Wing was determined neither to accept the lead of the writer, nor to allow him to control the machinery of the Congress, and it would tolerate him only as a puppet President. The Gandhi Wing had, moreover, this tactical advantage that it was the only organised party within the Congress, acting under a centralised leadership. The Left Wing or radical elements in the Congress who were responsible for the writer’s re-election as President in January, 1939, were numerically in a majority – but they were at disadvantage, because they were not organised under one leadership, as the Gandhi Wing was. There was till then, no party or group commanding the confidence of the entire Left Wing....Consequently, India’s primary political need in 1939 was an organised and disciplined Left Wing Party in the Congress.

Negotiations between Mahatma Gandhi and the writer revealed that on the one side, the Gandhi Wing would not follow the lead of the writer and that, on the other, the writer would not agree to be a puppet President. There was, consequently, no other alternative but to resign the Presidentship. This the writer did on the 29th April, 1939, and he immediately proceeded to form a radical and progressive party within the Congress, with a view to rallying the entire Left Wing under one banner. This Party was called the Forward Bloc. The first President of the Bloc was the writer and the Vice President (now acting President) was Sardar Sardul Singh Cavesheer of Punjab.]

- Subhas Chandra Bose, The Indian Struggle (1920-42), page 332-333

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